शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

सबके दाता राम- मलूकदास जी की कथा

मलूकदास जी कर्मयोगी संत थे. स्वाध्याय, सत्संग व भ्रमण से उन्होंने जो व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया उसका मुकाबला किताबी ज्ञान नहीं कर सकता. औरंगजेब जैसा पशुवत मनुष्य भी उनके सत्संग का सम्मान करता था.

शुरू में संत मलूकदास जी नास्तिक थे. उनके गांव में एक साधु आए और आकर टिक गए. साधुजी लोगों को रामायण सुनाते थे. प्रतिदिन सुबह-शाम गांव वाले उनका दर्शन करते और उनसे राम कथा का आनंद लेते.

संयोग से एक दिन मलूकदास भी राम कथा में पहुंचे. उस समय साधु महाराजा ग्रामीणों को श्रीराम की महिमा बताते कह रहे थे- श्रीराम संसार के सबसे बड़े दाता है. वह भूखों को अन्न, नंगों को वस्त्र और आश्रयहीनों को आश्रय देते हैं.

मलूकदास ने भी साधु की यह बात सुनी पर उनके पल्ले नहीं पड़ी. उन्होंने अपना विरोध जताते तर्क किया- क्षमा करे महात्मन ! यदि मैं चुपचाप बैठकर राम का नाम लूं, कोई काम न करूं, तब भी क्या राम भोजन देंगे ?

साधु ने पूरे विश्वास के साथ कहा- अवश्य देंगे. उनकी दृढता से मलूकदास के मन में एक और प्रश्न उभरा तो पूछ बैठे- यदि मैं घनघोर जंगल में अकेला बैठ जाऊं, तब ? साधु ने दृढ़ता के साथ कहा- तब भी श्रीराम भोजन देंगे !

बात मलूकदास को लग गई. अब तो श्रीराम की दानशीलता की परीक्षा ही लेनी है. पहुंच गए जंगल में और एक घने पेड़ के ऊपर चढ़कर बैठ गए. चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पेड़ थे. कंटीली झाड़ियां थीं. दूर-दूर तक फैले जंगल में धीरे-धीरे खिसकता हुआ सूर्य पश्चिम की पहाड़ियों के पीछे छुप गया. 

चारों तरफ अंधेरा फैल गया, मगर न मलूकदास को भोजन मिला, न वह पेड़ से ही उतरे. सारी रात बैठे रहे.

अगले दिन दूसरे पहर घोर सन्नाटे में मलूकदास को घोड़ों की टापों की आवाज सुनाई पड़ी. वह सतर्क होकर बैठ गए. थोड़ी देर में कुछ राजकीय अधिकारी उधर आते हुए दिखे. वे सब उसी पेड़ के नीचे घोड़ों से उतर पड़े. उन्होंने भोजन का मन बनाया. 

उसी समय जब एक अधिकारी थैले से भोजन का डिब्बा निकाल रहा था, शेर की जबर्दस्त दहाड़ सुनाई पड़ी. दहाड़ का सुनना था कि घोड़े बिदककर भाग गए.

अधिकारियों ने पहले तो स्तब्ध होकर एक-दूसरे को देखा, फिर भोजन छोड़ कर वे भी भाग गए. मलूकदास पेड़ से ये सब देख रहे थे. वह शेर की प्रतीक्षा करने लगे. मगर दहाड़ता हुआ शेर दूसरी तरफ चला गया.

मलूकदास को लगा, श्रीराम ने उसकी सुन ली है अन्यथा इस घनघोर जंगल में भोजन कैसे पहुंचता ? मगर मलूकदास तो मलूकदास ठहरे. उतरकर भला स्वयं भोजन क्यों करने लगे ! वह तो भगवान श्रीराम को परख रहे थे.

तीसरे पहर में डाकुओं का एक बड़ा दल उधर से गुजरा. पेड़ के नीचे चमकदार चांदी के बर्तनों में विभिन्न प्रकार के व्यंजनों के रूप में पड़े भोजन को देख कर डाकू ठिठक गए.

डाकुओं के सरदार ने कहा- भगवान श्रीराम की लीला देखो. हम लोग भूखे हैं और भोजन की प्रार्थना कर रहे थे. इस निर्जन वन में सुंदर डिब्बों में भोजन भेज दिया. इसे खा लिया जाए तो आगे बढ़ें.

मलूकदास को हैरानी हुई कि डाकू भी श्रीराम पर इतनी आस्था रखते हैं कि वह भोजन भेजेंगे. वह यह सब सोच ही रहे थे कि उन्हें डाकुओं की बात में कुछ शंका सुनाई पड़ी.

डाकू स्वभावतः शकी होते हैं. एक साथी ने सावधान किया- सरदार, इस सुनसान जंगल में इतने सजे-धजे तरीके से सुंदर बर्तनों में भोजन का मिलना मुझे तो रहस्यमय लग रहा है. कहीं इसमें विष न हो.

यह सुनकर सरदार बोला- तब तो भोजन लाने वाला आस पास ही कहीं छिपा होगा. पहले उसे तलाशा जाए. सरदार के आदेश पर डाकू इधर-उधर तलाशने लगे. तभी एक डाकू की नजर मलूकदास पर पड़ी.

उसने सरदार को बताया. सरदार ने सिर उठाकर मलूकदास को देखा तो उसकी आंखें अंगारों की तरह लाल हो गईं. उसने घुड़ककर कहा- दुष्ट ! भोजन में विष मिलाकर तू ऊपर बैठा है ! चल उतर.

सरदार की कड़कती आवाज सुनकर मलूकदास डर गए मगर उतरे नहीं. वहीं से बोले- व्यर्थ दोष क्यों मंढ़ते हो ? भोजन में विष नहीं है. सरदार ने आदेश दिया- पहले पेड़ पर चढ़कर इसे भोजन कराओ. झूठ-सच का पता अभी चल जाता है.

आनन-फानन में तीन-चार डाकू भोजन का डिब्बा उठाए पेड़ पर चढ़ गए और छुरा दिखा कर मलूकदास को खाने के लिए विवश कर दिया. मलूकदास ने स्वादिष्ट भोजन कर लिया. फिर नीचे उतरकर डाकुओं को पूरा किस्सा सुनाया.

डाकुओं ने उन्हें छोड़ दिया. वह स्वयं भोजन से भाग रहे थे लेकिन प्रभु की माया ऐसी रही कि उन्हें बलात भोजन करा दिया. इस घटना के बाद मलूकदास ईश्वर पक्के भक्त हो गए.

गांव लौटकर मलूकदास ने सर्वप्रथम एक दोहा लिखा–

अजगर करे न चाकरी

पंछी करे न काम,

दास मलूका कह गए

सबके दाता राम॥

यह दोहा आज खूब सुनाया जाता है. आपके कर्म शुद्ध हैं. आपने कभी किसी का अहित करने की मंशा नहीं रखी तो ईश्वर आपके साथ सबसे ज्यादा प्रेमपूर्ण भाव रखते हैं, चाहे आप उन्हें भजें या न भजें.

आपके कर्म अच्छे हैं तो आप यदि मलूकदास जी की तरह प्रभु की परीक्षा लेने लगे तो भी वह इसका बुरा नहीं मानते. आपके सत्कर्मों का सम्मान करते स्वयं परीक्षा देने आ जाते हैं. छोटे-बड़े की भावना ईश्वर में नहीं होती. ये विकार तो मनुष्य को क्षीण करते हैं।

 श्री राम जय राम जय जय राम

शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

सप्तम भाव- शादी चलेगी या नही?



कुंडली में शनि की स्थिति और विवाह उपाय 

शादी होना और शादी चलना यह दो अलग अलग बात है, कई बर ऐसी स्थिति पति-पत्नी के बीच बन जाती है कि शादी का रिश्ता टूटने की स्थिति में आ जाता है और बात तलाक आदि तक पहुँच जाती है।आज इसी विषय पर बात करते हैं यदि पति-पत्नी के बीच दूरियां हो गई है तो क्या शादी सही होकर चल पाएगी या नही और कैसे ठीक होगी?                                शादी में पति-पत्नी के बीच तब ही दूरियां बनती है मतलब अलग होने जैसी स्थितियां या तलाक आदि जैसी स्थितियां बनती है जब कुंडली का सातवाँ भाव(शादी भाव) और इसका स्वामी आदि पाप/अशुभ ग्रहों जैसे शनि राहु केतु मंगल/छठे आठवे बारहवे भाव स्वामियों या अस्त होकर बैठे अशुभ ग्रहों से दूषित होता है।तब इन पाप और अशुभ ग्रहों का 7वे भाव या 7वे भाव स्वामी या 7वे भाव-7वे भाव स्वामी दोनों पर इनका अशुभ प्रभाव पड़ता है लेकिन यदि सातवे भाव की स्थिति कही न कही शुभ और बलवान हुई, शुभ और अनुकूल ग्रहों का प्रभाव सातवे भाव/सातवे भाव स्वामी पर हुआ मतलब शादी चलने की स्थिति कुंडली मे है तो जो ग्रह वैवाहिक जीवन मे दिक्कत कर रहे है उनके उपाय करने के बाद शादी सही चलने लगती है और वैवाहिक जीवन सुखमय होने लगेगा।कैसे अब इस बात को उदाहरणो से समझते है कि शादी कैसी चल पाएगी, कैसे वैवाहिक जीवन मे दूरियां आदि होने पर वैवाहिक जीवन सुख से चल पाएगा?                                                          उदाहरण अनुसार मेष लग्न 1:- मेष लग्न में सातवें भाव का स्वामी शुक्र बनता है अब शुक्र के साथ राहु बैठा हो और कही न कही राहु या अन्य किसी पाप ग्रह जैसे शनि मंगल या केतु में से किसी का प्रभाव हो या तब शादी के बाद पति पत्नी में दूरियां जैसी स्थितिया ,वैवाहिक जीवन मे परेशानियां जैसी स्थितियां बनेगी, लेकिन अब विवाह स्वामी शुक्र यहां भाग्य स्वामी शुभ ग्रह बृहस्पति के साथ हो और गुरु की दृष्टि भी 7वे भाव पर पड़े तब शादी उपाय करने से ठीक हो जाएगी, परेशानियां जो भी विवाह सम्बन्धी होगी खत्म हो जाएगी दिक्कत करने वाले ग्रहों के शांति के उपाय करने से।                                                       

उदाहरण अनुसार कर्क लग्न 2:- कर्क लग्न में सातवें भाव(विवाह भाव)स्वामी शनि बनता है अब शादी यहाँ अस्त होकर रह केतु के साथ बैठा हो और सातवाँ भाव भी थोड़ा कमजोर हो तब वैवाहिक जीवन तलाक को ओर जाएगा, पति पत्नी में दूरियां बढ़ेगी, वैचारिक मतभेद आदि के कारण, लेकिन यही ऐसी स्थिति में सातवें भाव का स्वामी शनि जो राहु केतु के साथ है उस शनि के साथ गुरु शुक्र जैसी शुभ ग्रह भी बैठे हो तब शादी खण्डित नही होगी भले ही दूरियां हो जाये पति पत्नी में, अब यहां जो ग्रह दूरियां और दिक्कत कर रहे है उनकी शांति के उपाय करके शादी यहाँ पूरी तरह सही हो जाएगी क्योंकि सातवे भाव स्वामी शनि के साथ विवाह सुख के कारक दो शुभ ग्रह साथ बैठे है।                                                                    अब एक उदाहरण से समझते है कब शादी ठीक नही हो सकती या वैवाहिक जीवन मे पति पत्नी में दूरियां होने के बाद कब शादी नही सही हो सकती?                                         उदाहरण अनुसार कुंभ लग्न 3:- कुंभ लग्न में सातवें भाव का स्वामी सूर्य होता है ,अब सूर्य के साथ सूर्य का परम शत्रु राहु साथ बैठा हो और सातवें भाव मे कोई अस्त या छठे भाव का स्वामी यहाँ कुंभ लग्न में चन्द्रमा होता है यह सातवे भाव मे अस्त होकर या बहुत कमजोर होकर बैठे और सूर्य+सातवे भाव पर शुक्र+बुध या, गुरु प्रभाव ऐसी स्थिति में न हो तब यहां शादी नही चल पाएगी, तलाक या बिना तलाक अलग रहना पड़ेगा।                                                                          इस तरह यदि वैवाहिक जीवन मे दूरियां, दोनो पति पत्नी आपस मे अलग है, पति पत्नी आपस मे न बनने के कारण, वैचारिक मतभेद आदि के कारण तब यदि कुंडली में बचाब के योग है तब उपायों से ऐसी स्थिति में शादी बच जाएगी, वरना दोनों का तलाक होगा।

शनिवार, 30 दिसंबर 2023

पार्थिव श्रीगणेश पूजन का महत्त्व


अलग अलग कामनाओ की पूर्ति के लिए अलग अलग द्रव्यों से बने हुए गणपति की स्थापना की जाती हैं।


(1) श्री गणेश-  मिट्टी के पार्थिव श्री गणेश बनाकर पूजन करने से सर्व कार्य सिद्धि होती हे!                         


(2) हेरम्ब-  गुड़ के गणेश जी बनाकर पूजन करने से लक्ष्मी प्राप्ति होती हे। 

                                         

(3) वाक्पति-  भोजपत्र पर केसर से पर श्री गणेश प्रतिमा चित्र बनाकर।  पूजन करने से विद्या प्राप्ति होती हे।


 (4) उच्चिष्ठ गणेश-  लाख के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से स्त्री।  सुख और स्त्री को पतिसुख प्राप्त होता हे घर में ग्रह क्लेश निवारण होता हे। 


(5) कलहप्रिय-  नमक की डली या। नमक  के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से शत्रुओ में क्षोभ उतपन्न होता हे वह आपस में ही झगड़ने लगते हे। 


(6) गोबरगणेश-  गोबर के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से पशुधन में व्रद्धि होती हे और पशुओ की बीमारिया नष्ट होती है (गोबर केवल गौ माता का ही हो)।

                           

(7) श्वेतार्क श्री गणेश-  सफेद आक मन्दार की जड़ के श्री गणेश जी बनाकर पूजन करने से भूमि लाभ भवन लाभ होता हे। 

                       

(8) शत्रुंजय-  कडूए नीम की की लकड़ी से गणेश जी बनाकर पूजन करने से शत्रुनाश होता हे और युद्ध में विजय होती हे।

                           

(9) हरिद्रा गणेश-  हल्दी की जड़ से या आटे में हल्दी मिलाकर श्री गणेश प्रतिमा बनाकर पूजन करने से विवाह में आने वाली हर बाधा नष्ठ होती हे और स्तम्भन होता हे।


(10) सन्तान गणेश-  मक्खन के श्री गणेश जी बनाकर पूजन से सन्तान प्राप्ति के योग निर्मित होते हैं।


(11) धान्यगणेश- सप्तधान्य को पीसकर उनके श्रीगणेश जी बनाकर आराधना करने से धान्य व्रद्धि होती हे अन्नपूर्णा माँ प्रसन्न होती हैं।    


(12) महागणेश-  लाल चन्दन की लकड़ी से दशभुजा वाले श्री गणेश जी प्रतिमा निर्माण कर के पूजन से राज राजेश्वरी श्री आद्याकालीका की शरणागति प्राप्त होती हैं।

रविवार, 13 अगस्त 2023

१) जन्म कुंडली के केन्द्र भावों में यदि कोई ग्रह न हो (केंद्र भाव खाली हों) तो उसका फलित कैसे किया जाता है? २) जन्म कुंडली के केन्द्र भावों में यदि पाप ग्रह ही हों या सिर्फ़ पाप ग्रहों का ही प्रभाव दृष्टिगत हो तो उसका फलित कैसे किया जाता है?

केंद्र के स्वामी अपने स्वभाव को भूल जाते हैं और जैसे स्वभाव वाले ग्रह से संबंध हो वैसा फल देते हैं। त्रिकोण में हो यह त्रिकोण के स्वामी के साथ संबंध होने पर फल विशेष शुभ हो जाता है। यदि किसी दूसरे पाप स्थान 3,6,8,12 में हो या उनके स्वामी के साथ हो जैसे 3,6,8,12 के स्वामी के साथ संबंध हो जाए तो सामान्य रूप से फल देता है। 

शुभ ग्रह गुरु शुक्र केंद्रेश हैं, तो बुरे हैं। परंतु बुध केंद्रेश हो तो शुक्र की अपेक्षा कम बुराई करेगा। चंद्र केंद्रेश हो तो बुध से कम बुराई करेगा अर्थात चंद्र बुध शुक्र गुरु उत्तरोत्तर बुराई में बुरे हैं। 

स्वभाविक पाप ग्रह यदि केंद्रेश होकर त्रिषडाय (3-6-11) के भी स्वामी हो जाएं तो पाप कारक हो जाते हैं। 

पाप ग्रहों के केंद्रेश होने में इतना शुभत्व आ जाता है कि वह अपने पाप फल को नहीं देता यदि वह उस समय त्रिकोणेश भी हो जावे तो उसे शुभ फल देने का बल आ जाता है। 

जन्म कुंडली के केंद्र भावों में यदि पाप ग्रह ही हो या सिर्फ पाप ग्रहों का प्रभाव दृष्टिगत हो तो इसका फलित कैसे किया जाता है

1,4,7,10 स्थान क्रम से उत्तरोत्तर बली है। जैसे:- पाप ग्रह 1,4 भाव का स्वामी हो जाए तो लग्न की अपेक्षा चतुर्थेश शुभ फल देने में अधिक बली होगा। 

शनि की राशि 10,11 लग्न में हो और शनी उसे देख रहा हो तो लग्न बली हो जाता है। और शनी अपनी दशा अंतर्दशा में शुभ फल देता है। 

केंद्र में पाप ग्रह अशुभ फल देते हैं और आयु कम करते हैं। 


 कुंडली के केंद्र भावों में यदि कोई ग्रह न हो (केन्द्र भाव खाली हों ) तो उसका फलित निम्नानुसार भी किया जाता है :---

1केन्द्र भाव लग्न, चतुर्थ, सप्तम तथा दशम भाव होते हैं। प्रथम भाव, चतुर्थ भाव, सप्तम भाव तथा दशम भाव होते हैं। इन चारों भावों मे जो--जो राशि है,  उस राशि का स्वामी ग्रह जिन जिन भावों में स्थित होते हैं उनके अनुसार केन्द्र के भावों का फलित किया जाता है। यदि केन्द्र में स्थित राशि का स्वामी ग्रह यदि त्रिकोण भाव में स्थित हो तो शुभ फल प्राप्त होता  है। यदि केन्द्र में स्थित राशि का स्वामी ग्रह षष्ट, अष्ठम या द्वादश भाव मे स्थित हो तो शुभ फल मे कमी आयेगी । 

*केन्द्र के भावों मे लग्न, चतुर्थ, सप्तम दशम भाव पर जिस ग्रह की दृष्टि होती है के अनुसार भी केन्द्र के भाव का फलित किया जाता है। 

2-जन्म कुंडली के केन्द्र भावो मे यदि पाप ग्रह हो तो वह अपना पाप फल स्थगित कर देंगे। जैसे तुला लग्न की कुंडली में मंगल सप्तमेश है और द्वितीयेश भी है। द्वितीयेश होकर सम है और सप्तमेश होकर अपना अशुभ फल स्थगित कर देगा। इसलिए तुला लग्न में मंगल मारक का फल नहीं देता है। 

यदि केन्द्र में स्थित भावों पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो पाप ग्रह की स्थिति के अनुसार फलित बताना चाहिए ।केन्द्र मे स्थित भाव मे स्थित राशि और दृष्टि डालने वाले  पाप ग्रह किस भाव का स्वामी ग्रह है तथा लग्नेश का मित्र है या शत्रु है या सम भाव रखता है।  जिस भाव पर दृष्टि डाल रहा है उस भाव मे स्थित राशि से दृष्टि डालने वाले पाप ग्रह के मध्य मित्रता है या शत्रुताहै या सम भाव रखता है के अनुसार फलप्राप्त होगा।

शनिवार, 6 मई 2023

श्री श्याम ज्योतिष संस्थान : एक सूचना

 1 .आप सभी शुभचिंतको को सूचित किया जाता है की कल दिनांक 07/05/2023से इस ज्योतिष ब्लॉग हर रविवार को श्याम 4:00 pm से 5:00 pmके बीच सक्रिय रहूँगा | उस समय आप ब्लॉग  पर टिप्पणी के जरिये मुझसे संपर्क साध सकते है |मेरे द्वारा सभी को जवाब देने का प्रयास रहेगा |

2. रविवार के दिन ही निशुल्क परामर्श के लिए प्रातः 8:00 से 9:00 बजे के बीच ही whatsapp नंबर 9782316887 पर मेसेज करना होगा |आपके मेसेज में नाम ,जन्म दिनांक ,जन्म समय और जन्म स्थान बताना होगा और साथ में कोई कुंडली हो तो वो भी सेंड कर सकते है | अपना एक प्रश्न भी लिखना होगा जिसका आप जवाब चाहते है |याद रहे सिर्फ एक प्रश्न |अतिरिक्त प्रश्न के लिए आपको फीस देनी होगी |

3.प्रथम दो मेसेज करने वाले संपर्ककर्ताओ को परामर्श निशुल्क दिया जाएगा |बाकि संपर्ककर्ताओं को न्यूनतम फीस के द्वारा परामर्श दिया जाएगा |परामर्श शुल्क मुख्य फीस से 50% कम 251रुपये होगा |

4. जो भी व्यक्ति रविवार को संपर्क करता है  प्रातः 8:00 से 9:00 बजे के बीच में उसे ही यह लाभ दिया जाएगा |

5 .मेरे द्वारा परामर्श देने का समय श्याम 4.00से 5.00 बजे तक ही होगा |इस दौरान यदि सभी के जवाब नहीं दे पाया तो अगले दिन उनसे संपर्क कर के ही जरुर जवाब दिया जाएगा |

6 परामर्श का निर्धारित शुल्क पहले ही जमा करना होगा |शुल्क के बारे में जानकारी ब्लॉग पर पूर्व में ही मेरे द्वारा बताया जा चुका है | 

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2021

श्री श्याम ज्योतिष संस्थान : ज्योतिषीय उपाय के लिए सदा आपके साथ

 जीवन में उतार चढाव आते रहते है | किसी भी समस्या का ज्योतिषीय कारण और उपाय के लिए मुझे आप 9782316887 पर व्हाट्स अप करे या मुझे कॉल करें | मेरी फीस 501 रुपये है | पहले पूरी फीस मुझे किसी भी माध्यम से phone pay , google pay या  pay tm करे ,फीस जमा की रशीद भी डाले | थोडा समय दे निश्चित आपकी समस्या का समाधान किया जाएगा |

                                                                     ज्योतिषी रवि व्यास |

सोमवार, 3 जून 2019

केमद्रुम योग

॥ केमद्रुमे मलिन दुःखितनीचनिस्वो नृपजोपी ॥

केमद्रुम योग में जन्म हो तो राजा के यहाँ  जन्म पाया हुआ मनुष्य भी मलिन स्वभाव का वा मैला रहने वाला, दुःखी नीच प्रकृति वाला नीच दर्जे का और निर्धन मनुष्य होता है अर्थात्  साधारण मनुष्य के भंग रहित यह योग हो तो वह दरिद्री हुए बिना नहीं रहता।
यदि चन्द्रमा के दोनों तरफ़ कोई ग्रह न हो तो केमद्रुम योग बनता है। जिसके फलस्वरूप जातक गन्दा दुःखी, अनुचित काम करने वाला, ग़रीब, दूसरे पर निर्भर, दुष्ट और ठग होगा।

एक मान्यता यह भी है कि जन्म लग्न या चन्द्रमा से केन्द्र में ग्रह हों या चन्द्रमा किसी ग्रह से युक्त हो तो केमद्रुम योग नहीं बनता।
कुछ अन्य का मत है कि योग केन्द्र और नवांश से बनते हैं जो कि सामान्यतः स्वीकार्य नहीं है। वाराहमिहिर इस बात पर जोर देते हैं कि राजकीय परिवारों में पैदा होने वाले जातकों की कुंडली में इस प्रकार के योग बनते हों तो उनके मामले में साधारण परिवारों में पैदा होने वाले जातकों की अपेक्षा अधिक दुर्भाग्य की भविष्यवाणी करनी चाहिये।
दुःख का अर्थ शारीरिक तथा मानसिक दुःख होता  है। मूलतः नीच शब्द का प्रयोग किया जाता है और इससे ऐसे कार्यों का सम्बन्ध होता है जो धर्म, नैतिकता और सामाजिक व्यवस्था में मना है और इसे अपमानजनक माना जाता है।

केमद्रुम योग के भेद

केमद्रुम योग केवल चन्द्र के व्यय दूसरे स्थान में कोई भी ग्रह नहीं होने से ही होता है ऐसा नहीं है। जातक पारिजात में केमद्रुम के १३ भेद बताये हैं इनमे से कोई भी एक प्रकार का योग हो तो केमद्रुम योग हो जाता है।
 यह भेद इस प्रकार से हैं :-

1 लग्न में किंवा सप्तम में चन्द्रमा गया हो और उस पर गुरु की दृष्टि न हो तो केमद्रुम योग होता है। सर्वग्रह बलहीन व अष्टकवर्ग में ४ बिंदु से युक्त हो तो यह योग बलवान हो जाता है।
2 चन्द्रमा सूर्य से युत हो के नीच राशि में गये हुए ग्रह से दृष्ट हो और पापग्रह के नवांश में गया हो तो दरिद्र योग होता है।
3 क्षीण चन्द्रमा अष्टम स्थान में स्थित होकर पापग्रह से दृष्ट किंवा युत हो और रात्रि समय में जन्म हो तो केमद्रुम योग होता है।
4 चन्द्रमा राहु आदि पापग्रहों से पीड़ित होकर पापग्रहों से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग होता है।
5 लग्न से किंवा चन्द्रमा से चारों केन्द्र स्थान में पापग्रह गयें हों तो केमद्रुम योग बनता है।
6 चन्द्र पर बलहीन पराजित शुभग्रहों की दृष्टि हो और जन्म लग्न राहु आदि पापग्रहों से पीड़ित हो तो केमद्रुम योग होता है।
7 तुला राशि का चन्द्रमा शत्रुग्रह की राशि के वर्ग में हो और नीच तथा शत्रु राशि में गए हुए ग्रह से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग होता है।
8 नीच किंवा शत्रु राशिगत चन्द्रमा १, ४, ७, १० किंवा ९, ५ भाव में गया हो और चन्द्रमा से ६, ८, १२ वे स्थान में गुरु गया हो तो दरिद्र योग होता है।
9 चर राशि में चर राशि के ही नवमांश में गया हुआ चन्द्रमा पापग्रह के नवमांश में हो और अपने शत्रुग्रह से दृष्ट हो गुरु की दृष्टि से रहित हो तो महादरिद्र योग होता है।
10 नीच शत्रु पापग्रह की राशि नवांशादि वर्ग में गए हुए शनि शुक्र एक राशि से युक्त हो किंवा परस्पर दृष्ट हो तो केमद्रुम योग होता है। इस योग में राजवंश में जन्म पाया हुआ भी दरिद्री होता है।
11 पापग्रह की राशि में गया हुआ निर्बल चन्द्रमा पापग्रह से युक्त हो और पापग्रह के ही नवमांश में गया हो और रात्रि समय का जन्म हो तथा उसको दशमेश देखता हो तो केमद्रुम योग होता है।
12 नीच राशि के नवमांश में गया हुआ चन्द्रमा पाप ग्रह से युक्त हो के नवमेश से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग होता है।
13 रात्रि समय का जन्म हो और क्षीण चन्द्रमा नीच राशि में गया हुआ हो तो केमद्रुम योग होता है।
जिनके जन्म काल में ये दरिद्र योग [केमद्रुम] होता है उनका राजयोग भंग होता है।

केमद्रुम भंग योग -

1 जातक पारिजात में लिखा है। जिनके समय में
चन्द्रमा अथवा शुक्र केंद्र स्थान में स्थित हो और गुरु से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग का भंग [दरिद्र योग नहीं] करता है। 
2 चन्द्रमा शुभग्रह से युत हो अथवा शुभग्रहों के मध्य में गया हो और गुरु से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग नहीं होता है।
3 चन्द्रमा अधि मित्र राशि का किंवा अपनी उच्च राशि का हो अथवा अधिमित्र तथा अपनी उच्चराशि के नवमांश में गया हो और गुरु से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग नहीं होता है।
4 पूर्ण चन्द्रमा शुभ ग्रह से युत होकर बुध की उच्चराशि में गया हो और गुरु से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग नहीं होता है।
5 चन्द्रमा सर्व ग्रहों से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग का वहन भंग करता है।  

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