गुरुवार, 26 मार्च 2026

पराशरी ज्योतिष में ग्रह दृष्टि का सिद्धांत

पराशर मुनि के अनुसार, ग्रहों की दृष्टि का मतलब है कि एक ग्रह दूसरे ग्रह को देख रहा है, जिससे उसके प्रभाव में बदलाव आता है। यह दृष्टि ग्रहों के बीच के कोण पर निर्भर करती है।

पराशरी प्रणाली में ग्रहों की दृष्टियों का सिद्धान्त

सभी ग्रह जिस राशि मे स्थित हों,उससे सातवीं राशि, उसमें स्थित ग्रहों को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं।चौथे और आठवे भाव को 3/4 दृष्टि से,पाॅचवे और नवें भाव को 1/2दृष्टि से तथा तीसरे और दसवें भाव को 1/4दृष्टि से देखते हैं।

इसके अलावा मंगल चौथे और आठवे भाव को ,बृहस्पति पाॅचवे और नवें भाव को और शनि तीसरे और दसवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं।

पूर्ण दृष्टि से पूर्ण फल,3/4दृष्टि से तीन चौथाई 1/2दृष्टि से आधा फल और 1/4दृष्टि से एक चौथाई फल मिलता है।

सामान्य सप्तम दृष्टि वनाम विशिष्ट दृष्टियाॅ

सभी ग्रहों की सप्तम दृष्टि होती है, मतलब वे जिस भाव में होते हैं उसके सातवें भाव पर उनकी दृष्टि पड़ती है।

- मंगल की चौथी और आठवीं दृष्टि भी होती है।

- शनि की तीसरी और दसवीं दृष्टि होती है।

- बृहस्पति की पाँचवीं और नौवीं दृष्टि होती है।

- मंगल की चौथी और आठवी दृष्टि।

शनि की तीसरी और दसवी दृष्टि,बृहस्पति की पाॅचवी और नवी दृष्टि विशिष्ट दृष्टियाॅ हैं।

दृष्टि का बल--ग्रह बल,स्थिति और भाव के अनुसार परिवर्तन

दृष्टि का बल ग्रहों की स्थिति और भाव के अनुसार काफी बदलता है। ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की दृष्टि को बहुत महत्व दिया जाता है, क्योंकि यह ग्रहों के प्रभाव को अन्य भावों तक विस्तारित करती है।

ग्रहों की दृष्टि के प्रकार:

- पूर्ण दृष्टि: सभी ग्रह अपने से सातवें भाव पर पूर्ण दृष्टि डालते हैं।

- विशेष दृष्टि: मंगल, बृहस्पति, और शनि की विशेष दृष्टियां होती हैं।

- मंगल: चौथे और आठवें भाव पर पूर्ण दृष्टि।

- बृहस्पति: पांचवें और नौवें भाव पर पूर्ण दृष्टि।

- शनि: तीसरे और दसवें भाव पर पूर्ण दृष्टि।

ग्रहों की स्थिति और दृष्टि बल:

- उच्च राशि: ग्रह उच्च राशि में होने पर सबसे अधिक बलवान होते हैं (60 कलाएँ)।

- मूल त्रिकोण: मूल त्रिकोण में ग्रह 45 कलाएँ प्राप्त करते हैं।

- स्वराशि: स्वराशि में ग्रह 30 कलाएँ प्राप्त करते हैं।

भाव के अनुसार दृष्टि बल:

- लग्न: बुध और गुरु लग्न में बली होते हैं।

- चतुर्थ भाव: चन्द्रमा और शुक्र चतुर्थ भाव में बली होते हैं।

- सप्तम भाव: शनि सप्तम भाव में बली होते हैं।

- दशम भाव: सूर्य और मंगल दशम भाव में बली होते हैं।

शुभ ग्रह की दृष्टि बनाम पाप ग्रह की दृष्टि का व्यवहारिक अन्तर

ग्रहों की दृष्टि का हमारे जीवन पर काफी प्रभाव पड़ता है। शुभ ग्रह जैसे गुरु, शुक्र, और चंद्रमा की दृष्टि सकारात्मक प्रभाव डालती है, जबकि पाप ग्रह जैसे शनि, राहु, और केतु की दृष्टि नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।

शुभ ग्रह की दृष्टि:

- सकारात्मक ऊर्जा और अवसर प्रदान करती है

- जीवन में सुख, समृद्धि, और उन्नति लाती है

- समस्याओं का समाधान करने में मदद करती है

पाप ग्रह की दृष्टि:

- नकारात्मक ऊर्जा और चुनौतियाँ लाती है

- जीवन में बाधाएँ और समस्याएँ उत्पन्न कर सकती है

- सावधानी और सतर्कता की आवश्यकता होती है।

क्या दृष्टि योग निर्माण मे युति के समान प्रभावी हो सकती है?

दृष्टि योग भी युति की तरह ही एक महत्वपूर्ण योग है, जो ग्रहों के बीच संबंधों को दर्शाता है। 

दृष्टि योग में, एक ग्रह दूसरे ग्रह को देखता है, जिससे उनके प्रभाव में बदलाव आता है। यह योग भी युति की तरह ही फलदायी हो सकता है, लेकिन इसके प्रभाव अलग-अलग हो सकते हैं।

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