गुरुवार, 26 मार्च 2026

पराशरी ज्योतिष में ग्रह दृष्टि का सिद्धांत

पराशर मुनि के अनुसार, ग्रहों की दृष्टि का मतलब है कि एक ग्रह दूसरे ग्रह को देख रहा है, जिससे उसके प्रभाव में बदलाव आता है। यह दृष्टि ग्रहों के बीच के कोण पर निर्भर करती है।

पराशरी प्रणाली में ग्रहों की दृष्टियों का सिद्धान्त

सभी ग्रह जिस राशि मे स्थित हों,उससे सातवीं राशि, उसमें स्थित ग्रहों को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं।चौथे और आठवे भाव को 3/4 दृष्टि से,पाॅचवे और नवें भाव को 1/2दृष्टि से तथा तीसरे और दसवें भाव को 1/4दृष्टि से देखते हैं।

इसके अलावा मंगल चौथे और आठवे भाव को ,बृहस्पति पाॅचवे और नवें भाव को और शनि तीसरे और दसवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं।

पूर्ण दृष्टि से पूर्ण फल,3/4दृष्टि से तीन चौथाई 1/2दृष्टि से आधा फल और 1/4दृष्टि से एक चौथाई फल मिलता है।

सामान्य सप्तम दृष्टि वनाम विशिष्ट दृष्टियाॅ

सभी ग्रहों की सप्तम दृष्टि होती है, मतलब वे जिस भाव में होते हैं उसके सातवें भाव पर उनकी दृष्टि पड़ती है।

- मंगल की चौथी और आठवीं दृष्टि भी होती है।

- शनि की तीसरी और दसवीं दृष्टि होती है।

- बृहस्पति की पाँचवीं और नौवीं दृष्टि होती है।

- मंगल की चौथी और आठवी दृष्टि।

शनि की तीसरी और दसवी दृष्टि,बृहस्पति की पाॅचवी और नवी दृष्टि विशिष्ट दृष्टियाॅ हैं।

दृष्टि का बल--ग्रह बल,स्थिति और भाव के अनुसार परिवर्तन

दृष्टि का बल ग्रहों की स्थिति और भाव के अनुसार काफी बदलता है। ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की दृष्टि को बहुत महत्व दिया जाता है, क्योंकि यह ग्रहों के प्रभाव को अन्य भावों तक विस्तारित करती है।

ग्रहों की दृष्टि के प्रकार:

- पूर्ण दृष्टि: सभी ग्रह अपने से सातवें भाव पर पूर्ण दृष्टि डालते हैं।

- विशेष दृष्टि: मंगल, बृहस्पति, और शनि की विशेष दृष्टियां होती हैं।

- मंगल: चौथे और आठवें भाव पर पूर्ण दृष्टि।

- बृहस्पति: पांचवें और नौवें भाव पर पूर्ण दृष्टि।

- शनि: तीसरे और दसवें भाव पर पूर्ण दृष्टि।

ग्रहों की स्थिति और दृष्टि बल:

- उच्च राशि: ग्रह उच्च राशि में होने पर सबसे अधिक बलवान होते हैं (60 कलाएँ)।

- मूल त्रिकोण: मूल त्रिकोण में ग्रह 45 कलाएँ प्राप्त करते हैं।

- स्वराशि: स्वराशि में ग्रह 30 कलाएँ प्राप्त करते हैं।

भाव के अनुसार दृष्टि बल:

- लग्न: बुध और गुरु लग्न में बली होते हैं।

- चतुर्थ भाव: चन्द्रमा और शुक्र चतुर्थ भाव में बली होते हैं।

- सप्तम भाव: शनि सप्तम भाव में बली होते हैं।

- दशम भाव: सूर्य और मंगल दशम भाव में बली होते हैं।

शुभ ग्रह की दृष्टि बनाम पाप ग्रह की दृष्टि का व्यवहारिक अन्तर

ग्रहों की दृष्टि का हमारे जीवन पर काफी प्रभाव पड़ता है। शुभ ग्रह जैसे गुरु, शुक्र, और चंद्रमा की दृष्टि सकारात्मक प्रभाव डालती है, जबकि पाप ग्रह जैसे शनि, राहु, और केतु की दृष्टि नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।

शुभ ग्रह की दृष्टि:

- सकारात्मक ऊर्जा और अवसर प्रदान करती है

- जीवन में सुख, समृद्धि, और उन्नति लाती है

- समस्याओं का समाधान करने में मदद करती है

पाप ग्रह की दृष्टि:

- नकारात्मक ऊर्जा और चुनौतियाँ लाती है

- जीवन में बाधाएँ और समस्याएँ उत्पन्न कर सकती है

- सावधानी और सतर्कता की आवश्यकता होती है।

क्या दृष्टि योग निर्माण मे युति के समान प्रभावी हो सकती है?

दृष्टि योग भी युति की तरह ही एक महत्वपूर्ण योग है, जो ग्रहों के बीच संबंधों को दर्शाता है। 

दृष्टि योग में, एक ग्रह दूसरे ग्रह को देखता है, जिससे उनके प्रभाव में बदलाव आता है। यह योग भी युति की तरह ही फलदायी हो सकता है, लेकिन इसके प्रभाव अलग-अलग हो सकते हैं।

कुंडली में मारक ग्रह का निर्णय कैसे किया जाता है ?

ज्योतिष में मारक ग्रह (Maraka Graha) वे ग्रह होते हैं जो व्यक्ति के जीवन में मृत्यु या मृत्यु-समान कष्ट देने की क्षमता रखते हैं। इनका निर्णय मुख्य रूप से लग्न से 2nd और 7th भाव के आधार पर किया जाता है।

1. मुख्य मारक भाव

कुंडली में दो भाव सबसे प्रमुख मारक माने जाते हैं:

2nd भाव (द्वितीय भाव)

7th भाव (सप्तम भाव)

इन दोनों भावों के स्वामी ग्रह को मारकेश कहा जाता है।

2. मारक ग्रह कैसे तय करते हैं

किसी भी कुंडली में मारक ग्रह का निर्णय इस प्रकार किया जाता है:

1. द्वितीय भाव का स्वामी

2nd house का स्वामी ग्रह मारक होता है।

2. सप्तम भाव का स्वामी

7th house का स्वामी भी प्रमुख मारक ग्रह होता है।

3. 2nd या 7th भाव में बैठे ग्रह

जो भी ग्रह इन भावों में बैठे हों, वे भी मारक प्रभाव दे सकते हैं।

4. मारकेश से युति या दृष्टि वाले ग्रह

जो ग्रह मारकेश के साथ जुड़े हों या उसकी दृष्टि में हों, वे भी मारक प्रभाव दे सकते हैं।

सहायक मारक ग्रह

कुछ स्थितियों में ये ग्रह भी मारक बन सकते हैं:

8th भाव का स्वामी (आयु भाव)

3rd भाव का स्वामी (आयु का उपभाव)

12th भाव का स्वामी (हानि और अंत का भाव)

4 दशा में मारक प्रभाव

मारक ग्रह सामान्यतः दशा-अंतरदशा में परिणाम देते हैं, विशेषकर जब:

मारकेश की दशा हो

मारकेश और अष्टमेश की संयुक्त दशा हो

मारकेश अशुभ ग्रहों से पीड़ित हो

उदाहरण

मान लीजिए तुला लग्न है:

2nd भाव = वृश्चिक → स्वामी Mars

7th भाव = मेष → स्वामी Mars

इसलिए तुला लग्न में Mars (मंगल) मुख्य मारकेश बन जाता है।

6 महत्वपूर्ण नियम

यदि मारक ग्रह शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो मृत्यु नहीं बल्कि कष्ट, बीमारी, दुर्घटना दे सकता है।

यदि आयु मजबूत हो तो मारक दशा में केवल परेशानी या बड़ा परिवर्तन आता है।


अगर आप चाहें तो मैं आपको आपकी कुंडली में मारक ग्रह, आयु योग और मृत्यु कारक ग्रहों का गुप्त विश्लेषण भी बता सकता हूँ।

🔱 कुंडली में मारकेश ग्रह : विस्तृत शास्त्रीय विवेचन 🔱

🌺 मारकेश ग्रह क्या होता है?

ज्योतिष शास्त्र में मारकेश उस ग्रह को कहा जाता है जो अपनी महादशा / अंतरदशा में जातक को

मरणतुल्य कष्ट, अत्यधिक पीड़ा, संकट या कभी-कभी वास्तविक मृत्यु तक के योग उत्पन्न कर सकता है।

👉 यहाँ यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि

“मृत्यु” का अर्थ केवल देहांत नहीं है।

यह शब्द जीवन में आने वाले गहन संकट, अपमान, रोग, मानसिक टूटन, आर्थिक पतन, सामाजिक प्रतिष्ठा की हानि आदि को भी दर्शाता है।

🌼 शास्त्रों में वर्णित 8 प्रकार की “मृत्यु तुल्य स्थिति”

ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार मारकेश की दशा में जातक निम्नलिखित आठ प्रकार के कष्टों से गुजर सकता है:

व्यथा – शारीरिक या मानसिक पीड़ा

दुःख – पारिवारिक, आर्थिक या भावनात्मक

भय – दुर्घटना, शत्रु या अनहोनी का डर

लज्जा – समाज में अपमान

रोग – दीर्घकालिक या अचानक उत्पन्न बीमारी

शोक – प्रियजनों का वियोग

मरण – वास्तविक मृत्यु (दुर्लभ परंतु संभव)

अपमान – मान-प्रतिष्ठा का नाश

🌺 मारकेश बनने के मुख्य सिद्धांत

1. द्वितीय और सप्तम भाव

द्वितीय भाव (आयु का मारक)

सप्तम भाव (जीवन शक्ति का मारक)

👉 इन भावों के स्वामी प्राथमिक मारकेश माने जाते हैं।

2. ग्रहों की दशा और अंतर्दशा

मारकेश ग्रह की महादशा / अंतर्दशा में संकट बढ़ता है

यदि साथ में अष्टमेश, षष्ठेश या द्वादशेश सक्रिय हों, तो कष्ट कई गुना बढ़ जाता है

🌼 विशेष मारकेश योग (शास्त्रसम्मत)

🌹 सूर्य की महादशा में केतु की अंतर्दशा मारक तुल्य मानी जाती है।

🌹 शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या चल रही हो तो

➡️ शुभ ग्रहों की दशा भी अपेक्षित फल नहीं देती।

🌹 लग्नेश से अष्टमेश अधिक बलवान हो

➡️ अष्टमेश की अंतर्दशा मारक बन जाती है।

🌹 षष्ठेश शनि होकर लग्न को देखे

➡️ मंगल, राहु जैसे पाप ग्रहों की दशा में

➡️ लग्नेश भी मारक बन जाता है।

🌹 अष्टमेश सप्तम भाव में होकर लग्न को देखे

➡️ पाप ग्रह की दशा में लग्नेश भी मारक कार्य करता है।

🌹 अष्टमेश चतुर्थ भाव में शत्रु राशि में

➡️ अपनी दशा में मारक फल देता है।

🌹 पाप दृष्ट द्वितीयेश यदि स्वयं पाप ग्रह हो

➡️ पूर्ण मारक बन जाता है।

🌹 सप्तमेश पाप ग्रह हो और पाप दृष्ट हो

➡️ उसके साथ युति करने वाला ग्रह भी मारक बनता है।

👉👉 यदि शनि किसी मारकेश ग्रह के साथ हो

➡️ शनि स्वयं मारक का भार अपने ऊपर ले लेता है।

🌹 द्वादशेश यदि स्वयं पाप ग्रह हो

➡️ मारक फल देता है।

🌹 षष्ठेश पाप ग्रह, पाप राशि, पाप दृष्ट

➡️ उसकी दशा में मृत्यु संभाव्य हो जाती है।

🌹 छठे, आठवें, बारहवें भाव में स्थित राहु-केतु

➡️ मारक तुल्य प्रभाव देते हैं।

🌼 विशेष लग्न अनुसार मारकेश संकेत

⚠️ सूर्य और चंद्रमा को सामान्यतः मारकेश दोष नहीं लगता

मेष लग्न → शुक्र मारकेश होकर भी अकेला घातक नहीं, पर शनि + शुक्र अत्यंत घातक

वृष लग्न → गुरु अशुभ

मिथुन लग्न → मंगल और गुरु अशुभ

कर्क लग्न → शुक्र मारक

सिंह लग्न → शनि और बुध

कन्या लग्न → मंगल

तुला लग्न → मंगल, गुरु

वृश्चिक लग्न → बुध

धनु लग्न → शनि, शुक्र

मकर लग्न → मंगल

कुंभ लग्न → गुरु, मंगल

मीन लग्न → मंगल, शनि

🌹 मकर और वृश्चिक लग्न वालों के लिए

➡️ राहु की दशा मारक तुल्य होती है।

🌺 निष्कर्ष

मारकेश ग्रह का प्रभाव कुंडली के संपूर्ण अध्ययन,दशा क्रम,ग्रह बल,दृष्टि,योग-अयोग पर निर्भर करता है।

👉 केवल ग्रह का नाम देखकर भयभीत होना उचित नहीं।

👉 सही मार्गदर्शन, उपाय, और आत्मबल से

👉 मारकेश के प्रभाव को काफी हद तक संतुलित किया जा सकता है।

कुंडली में ग्रहों की दृष्टि – क्या सभी दृष्टियाँ समान प्रभाव देती हैं ?

ज्योतिष में “दृष्टि” का अर्थ है किसी ग्रह का दूसरे भाव या ग्रह पर पड़ने वाला प्रभाव। यह प्रभाव केवल भौतिक दूरी से नहीं बल्कि सूक्ष्म ऊर्जा के आदान-प्रदान से समझा जाता है। क्या सभी दृष्टियाँ समान प्रभाव देती हैं?

इसका उत्तर है—नहीं। विभिन्न ग्रहों की दृष्टियाँ, उनका बल, स्थिति और स्वभाव के अनुसार उनका प्रभाव अलग-अलग होता है।

१. पाराशरी प्रणाली में ग्रह दृष्टियों का सिद्धांत

पाराशरी ज्योतिष के अनुसार प्रत्येक ग्रह अपनी स्थिति से सप्तम भाव (7वें घर) पर पूर्ण दृष्टि डालता है। इसे सामान्य या सार्वभौमिक दृष्टि कहा जाता है।

अर्थात यदि कोई ग्रह किसी भाव में स्थित है तो वह उसके ठीक सामने वाले भाव को प्रभावित करेगा। यह दृष्टि लगभग हर ग्रह के लिए समान नियम से लागू होती है और उस भाव के फल को सक्रिय करती है।

२. सामान्य सप्तम दृष्टि बनाम विशेष दृष्टियाँ (मंगल, गुरु, शनि)

कुछ ग्रहों को पाराशरी प्रणाली में विशेष दृष्टियाँ प्राप्त हैं:

मंगल – 4वीं, 7वीं और 8वीं दृष्टि

गुरु – 5वीं, 7वीं और 9वीं दृष्टि

शनि – 3वीं, 7वीं और 10वीं दृष्टि

इन विशेष दृष्टियों का अर्थ यह है कि ये ग्रह अपने स्वभाव के अनुसार कुछ अतिरिक्त भावों को भी प्रभावित करते हैं।

मंगल की दृष्टि जहाँ पड़ती है वहाँ ऊर्जा, संघर्ष या सक्रियता बढ़ाती है।

गुरु की दृष्टि वृद्धि, ज्ञान और संरक्षण देती है।

शनि की दृष्टि अनुशासन, विलंब और कर्मफल को प्रबल करती है।

इस कारण केवल सप्तम दृष्टि ही नहीं, बल्कि इन विशेष दृष्टियों के प्रभाव भी अलग-अलग प्रकार के परिणाम देते हैं।

३. दृष्टि का बल – ग्रहबल, स्थिति और भाव के अनुसार परिवर्तन

दृष्टि का प्रभाव स्थिर नहीं होता; यह कई कारकों पर निर्भर करता है:

ग्रहबल– उच्च, नीच, स्वगृही या वक्री ग्रह की दृष्टि का प्रभाव भिन्न होगा।

भाव स्थिति– जिस भाव पर दृष्टि पड़ रही है, उसका स्वभाव भी फल को बदल देता है।

दृष्टि देने वाले ग्रह की दशा – ग्रह की दशा-अंतर्दशा में उसकी दृष्टि अधिक सक्रिय होती है।

डिग्री संबंध– जितना निकट कोणीय संबंध होगा, प्रभाव उतना प्रबल माना जाता है।

इसलिए एक ही ग्रह की दृष्टि अलग-अलग कुंडलियों में अलग परिणाम दे सकती है।

४. शुभ ग्रह की दृष्टि बनाम पाप ग्रह की दृष्टि

ज्योतिष में ग्रहों को सामान्यतः दो वर्गों में देखा जाता है:*

शुभ ग्रह: गुरु, शुक्र, बुध (शुभ अवस्था में), चंद्र

पाप ग्रह: शनि, मंगल, राहु, केतु, सूर्य (कठोर प्रभाव वाला)

शुभ ग्रह की दृष्टि अक्सर उस भाव को संरक्षण, वृद्धि और संतुलन देती है।

पाप ग्रह की दृष्टि चुनौतियाँ, संघर्ष या कर्मफल के रूप में परिणाम ला सकती है।

हालाँकि यह हमेशा नकारात्मक नहीं होता। उदाहरण के लिए, शनि की दृष्टि कठिन परिश्रम और स्थायित्व भी दे सकती है।

५. क्या दृष्टि योग निर्माण में युति के समान प्रभावी हो सकती है?

युति (conjunction) तब बनती है जब दो ग्रह एक ही भाव में साथ हों। यह सीधा और शक्तिशाली संबंध होता है।

दृष्टि भी ग्रहों के बीच संबंध स्थापित करती है, परंतु सामान्यतः उसका प्रभाव युति से थोड़ा कम प्रत्यक्ष माना जाता है। फिर भी कुछ स्थितियों में दृष्टि बहुत शक्तिशाली हो सकती है, जैसे:

गुरु की पूर्ण दृष्टि किसी भाव पर

शनि की दशम दृष्टि कर्म भाव पर

मंगल की चौथी या आठवीं दृष्टि

ऐसे मामलों में दृष्टि योग निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

निष्कर्ष:

कुंडली में सभी दृष्टियाँ समान प्रभाव नहीं देतीं। ग्रह का स्वभाव, उसकी शक्ति, विशेष दृष्टियाँ, तथा जिस भाव पर दृष्टि पड़ रही है—इन सबका संयुक्त प्रभाव फल को निर्धारित करता है। इसलिए किसी भी कुंडली का सही विश्लेषण करते समय केवल दृष्टि की उपस्थिति नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता और संदर्भ को भी समझना आवश्यक है।

रविवार, 15 मार्च 2026

लग्नेश का महत्व — क्या सबल लग्नेश अनेक दोषों को संतुलित कर सकता है?

 लग्न और लग्नेश ज्योतिष में बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इसे हम निम्न प्रकार समझते हैं:-------

लग्न (Ascendant/Lascum)

लग्न वह राशि होती है जो जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर उदय हो रही होती है। यह आपकी बाहरी व्यक्तित्व, स्वभाव और जीवन की दिशा को दर्शाती है। इसे प्रथम भाव भी कहते हैं।

लग्नेश (Lord of Ascendant)

लग्नेश वह ग्रह होता है जो लग्न में स्थित राशि का स्वामी होता है। यह आपकी ऊर्जा, स्वास्थ्य और जीवन शक्ति को प्रभावित करता है।

उदाहरण के लिए, अगर आपका लग्न मेष है, तो मंगल आपका लग्नेश होगा।

लग्न और लग्नेश का महत्व हम निम्न विन्दुओं के जरिये समझने का प्रयास करते हैं:------

(1) लग्न और लग्नेश का ज्योतिषीय आधार---जीवन की मूल धुरी

लग्न और लग्नेश जीवन की मूल धुरी है, जो आपके जीवन की दिशा और गति को निर्धारित करते हैं।

लग्न का महत्व:

1. जीवन की दिशा: लग्न आपके जीवन की दिशा को निर्धारित करता है, जो आपके जन्म के समय के आधार पर तय होता है।

2. व्यक्तित्व: लग्न आपके व्यक्तित्व को दर्शाता है, जिसमें आपकी सोच, भावनाएं, और व्यवहार शामिल हैं।

3. जीवन के उद्देश्य: लग्न आपके जीवन के उद्देश्य को निर्धारित करता है, जो आपके जन्म के समय के आधार पर तय होता है।

लग्नेश का महत्व:

1. जीवन की शक्ति: लग्नेश आपके जीवन की शक्ति को दर्शाता है, जो आपके आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान को बढ़ाता है।

2. सफलता और असफलता: लग्नेश आपके जीवन में सफलता और असफलता का कारण बनता है।

3. जीवन के विभिन्न पहलू: लग्नेश आपके जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे कि स्वास्थ्य, धन, संबंध, करियर आदि को प्रभावित करता है।

लग्न और लग्नेश का संबंध:

1. संतुलन: लग्न और लग्नेश का संतुलन आपके जीवन में संतुलन और स्थिरता को बढ़ाता है।

2. शक्ति और दिशा: लग्नेश आपके जीवन को शक्ति और दिशा प्रदान करता है, जबकि लग्न आपके जीवन की दिशा को निर्धारित करता है।

3. जीवन की सफलता: लग्न और लग्नेश का संतुलन आपके जीवन में सफलता को बढ़ाता है।

(2) सबल लग्नेश का प्रभाव---स्वास्थय,निर्णय शक्ति और जीवन दिशा

सबल लग्नेश हमारे जीवन के कई पहलुओं पर निम्न  प्रकार सकारात्मक प्रभाव डालता है:---

स्वास्थ्य: एक मजबूत लग्नेश आपको अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करता है, जिससे आप ऊर्जावान और सक्रिय रहते हैं। यह आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है, जिससे आप बीमारियों से लड़ने में सक्षम होते हैं।

निर्णय शक्ति: लग्नेश के बलवान होने से आपकी निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है। आप आत्मविश्वास से भरपूर होते हैं और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए दृढ़ संकल्पित रहते हैं।

जीवन दिशा: एक मजबूत लग्नेश आपके जीवन को एक स्पष्ट दिशा प्रदान करता है। आप अपने जीवन के उद्देश्य को समझते हैं और उसे प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं।

इसके अलावा, लग्नेश के बलवान होने से आपको प्रसिद्धि, सम्मान और समृद्धि भी प्राप्त होती है। यह आपके व्यक्तित्व को आकर्षक बनाता है और आपको नेतृत्व क्षमता प्रदान करता है।

(3)यदि कुंडली में अनेक दोष होंतो क्या सबल लग्नेश उन्हें संतुलित कर सकता है?

 सबल लग्नेश कुंडली के कई दोषों को संतुलित कर सकता है, लेकिन यह सब कुंडली में स्थित ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करता है।

कैसे संतुलित करता है?

1. नकारात्मक प्रभावों को कम करता है: एक मजबूत लग्नेश कुंडली में मौजूद नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को कम कर सकता है।

2. सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है: लग्नेश के बलवान होने से आपकी सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है, जिससे आप जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए अधिक सक्षम होते हैं।

3. कुंडली के अन्य ग्रहों को प्रभावित करता है: एक मजबूत लग्नेश कुंडली के अन्य ग्रहों को भी प्रभावित कर सकता है, जिससे उनका नकारात्मक प्रभाव कम हो सकता है।

क्या सबल लग्नेश सभी दोषों को संतुलित कर सकता है?

नहीं, सबल लग्नेश सभी दोषों को संतुलित नहीं कर सकता है। कुछ दोष इतने मजबूत होते हैं कि उन्हें संतुलित करने के लिए विशेष उपायों की आवश्यकता होती है, जैसे कि पूजा, दान।

कुंडली के दोष जो सबल लग्नेश संतुलित कर सकता है:

1. ग्रहों की नकारात्मक स्थिति: सबल लग्नेश ग्रहों की नकारात्मक स्थिति के प्रभाव को कम कर सकता है।

2. दशा की नकारात्मकता: लग्नेश के बलवान होने से दशा की नकारात्मकता कम हो सकती है।

3. कुंडली में अशुभ योग: सबल लग्नेश कुंडली में अशुभ योगों के प्रभाव को कम कर सकता है।

क्या करें?

यदि आप अपने लग्नेश को मजबूत करना चाहते हैं, तो आप निम्नलिखित उपाय कर सकते हैं:

1. लग्नेश के लिए पूजा करें: अपने लग्नेश के अनुसार पूजा करें, जैसे कि सूर्य के लिए सूर्य पूजा, चंद्र के लिए चंद्र पूजा, आदि।

2. रत्न पहनें: अपने लग्नेश के अनुसार रत्न पहनें, जैसे कि मणि, मूंगा, आदि।

3. दान करें: अपने लग्नेश के अनुसार दान करें, जैसे कि अनाज, कपड़े, आदि।

(4.)निर्बल लग्नेश होने पर शुभ योगों का प्रभाव कितना घटता है?

 निर्बल लग्नेश कुंडली के शुभ प्रभावों को काफी हद तक कम कर सकता है। जो कि निम्न है:--

शुभ प्रभावों में कमी:

1. स्वास्थ्य पर प्रभाव: निर्बल लग्नेश आपके स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, जिससे आप बीमारियों से लड़ने में असक्षम हो सकते हैं।

2. निर्णय शक्ति में कमी: लग्नेश के निर्बल होने से आपकी निर्णय लेने की क्षमता कम हो सकती है, जिससे आप सही निर्णय लेने में असमर्थ हो सकते हैं।

3. जीवन में असफलता: निर्बल लग्नेश आपके जीवन में असफलता का कारण बन सकता है, जिससे आप अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

4. नकारात्मक सोच: लग्नेश के निर्बल होने से आपकी सोच नकारात्मक हो सकती है, जिससे आप जीवन को नकारात्मक दृष्टिकोण से देखते हैं।

5. समस्याओं का सामना: निर्बल लग्नेश आपको समस्याओं का सामना करने में असमर्थ बना सकता है, जिससे आप जीवन में आने वाली चुनौतियों से लड़ नहीं पाते हैं।

कुंडली के अन्य ग्रहों पर प्रभाव:

निर्बल लग्नेश कुंडली के अन्य ग्रहों पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, जिससे उनके शुभ प्रभाव कम हो सकते हैं।

क्या करें?

यदि आपका लग्नेश निर्बल है, तो आप निम्नलिखित उपाय कर सकते हैं:

1. लग्नेश के लिए पूजा करें: अपने लग्नेश के अनुसार पूजा करें, जैसे कि सूर्य के लिए सूर्य पूजा, चंद्र के लिए चंद्र पूजा, आदि।

2. रत्न पहनें: अपने लग्नेश के अनुसार रत्न पहनें, जैसे कि मणि, मूंगा, आदि।

3. दान करें: अपने लग्नेश के अनुसार दान करे।

(5)नवांश और दशा मे लग्नेश की भूमिका

नवांश और दशा में लग्नेश की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। इसे निम्न प्रकार से समझा जा सकता है:---

नवांश में लग्नेश:

1. लग्नेश की स्थिति: नवांश में लग्नेश की स्थिति आपके जीवन के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करती है।

2. शुभ या अशुभ प्रभाव: नवांश में लग्नेश की स्थिति के आधार पर आपको शुभ या अशुभ प्रभाव मिलते हैं।

3. जीवन के विभिन्न पहलू: नवांश में लग्नेश की स्थिति आपके जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे कि स्वास्थ्य, धन, संबंध, करियर आदि को प्रभावित करती है।

दशा में लग्नेश:

1. दशा का प्रभाव: दशा में लग्नेश का प्रभाव आपके जीवन पर पड़ता है, जिससे आपके जीवन में परिवर्तन आते हैं।

2. शुभ या अशुभ प्रभाव: दशा में लग्नेश के प्रभाव के आधार पर आपको शुभ या अशुभ फल मिलते हैं।

3. जीवन के विभिन्न पहलू: दशा में लग्नेश का प्रभाव आपके जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे कि स्वास्थ्य, धन, संबंध, करियर आदि पर पड़ता है।

लग्नेश की भूमिका:

1. जीवन की दिशा: लग्नेश आपके जीवन की दिशा को निर्धारित करता है।

2. सफलता और असफलता: लग्नेश आपके जीवन में सफलता और असफलता का कारण बनता है।

3. जीवन के विभिन्न पहलू: लग्नेश आपके जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे कि स्वास्थ्य, धन, संबंध, करियर आदि को प्रभावित करता है।

क्या करें?

यदि हम अपने लग्नेश की भूमिका को समझना चाहते हैं, तो हम निम्नलिखित तरीके से समझ सकते हैं:---

1. कुंडली विश्लेषण: अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाएं, जिससे आपको अपने लग्नेश की स्थिति के बारे में पता चल सके।

2. लग्नेश के लिए पूजा: अपने लग्नेश के अनुसार पूजा करें, जैसे कि सूर्य के लिए सूर्य पूजा, चंद्र के लिए चंद्र पूजा, आदि।

3. रत्न पहनें: अपने लग्नेश के अनुसार रत्न पहनें, जैसे कि मणि, मूंगा, आदि।

नीच ग्रह: क्या वास्तव में सदैव दुर्बल और अशुभ होते हैं?

 ज्योतिष शास्त्र में “नीच” शब्द सुनते ही अक्सर नकारात्मक छवि उभरती है – कमजोर, पीड़ादायक, असफलता वाला। लेकिन क्या यह धारणा पूरी तरह सही है? पाराशर, फलदीपिका और उत्तर कालामृत जैसे शास्त्रों को ध्यान से पढ़ें तो पता चलता है कि नीचत्व कोई “अभिशाप” नहीं, बल्कि ग्रह के स्वभाव का असंतुलन या विशेष परिस्थिति है।

१. नीचत्व का शास्त्रीय अर्थ

शास्त्रों में नीच का अर्थ है – “स्वक्षेत्र से विपरीत राशि में स्थित होकर ग्रह अपना सामान्य स्वभाव पूर्ण रूप से नहीं दिखा पाता”।

•  सूर्य नीच (तुला) → नेतृत्व क्षमता पर अंकुश, लेकिन अहंकार का संतुलन सिखाता है।

•  चंद्र नीच (वृश्चिक) → मन की अस्थिरता, लेकिन गहरी संवेदनशीलता देता है।

•  मंगल नीच (कर्क) → क्रोध पर नियंत्रण की सीख।

यह “दुर्बलता” नहीं, बल्कि स्वभाव का विशेष मोड़ है। ठीक उसी तरह जैसे सोना आग में तपने पर निखरता है, वैसे ही नीच ग्रह भी विशेष परिस्थिति में अपनी छिपी शक्ति दिखाता है।

२. नीच ग्रह का व्यवहारिक फल – सदैव कष्ट ही?

नहीं।

वास्तविक जीवन में देखें तो बहुत से सफल लोग नीच ग्रहों के धनी होते हैं, लेकिन वे “अच्छे स्थान” (केंद्र/त्रिकोण) में हों या अन्य बल प्राप्त हों। उदाहरण:

•  राहुल गांधी, अमिताभ बच्चन, साक्षी मलिक, विराट कोहली – इनकी इंटरनेट पर मजूद कुंडलियों में एक-दो नीच ग्रह हैं, परिणाम? संघर्ष के बाद अपार सफलता।
नीच ग्रह कष्ट अवश्य देता है, लेकिन वह कष्ट “शिक्षा” का रूप लेता है। वह व्यक्ति को विनम्र, मेहनती और अंतर्मुखी बनाता है। सदैव अशुभ नहीं – जब तक वह “मरण-मरण” (पूर्ण नीच) न हो और कोई बचाव न हो।

३. नीचभंग राजयोग – सिद्धांत और वास्तविकता

यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है।

शास्त्रीय सिद्धांत (फलदीपिका, उत्तर कालामृत):

नीच ग्रह के नीचभंग के ४ मुख्य कारण –

1.  नीच राशि का स्वामी लग्न या चंद्र से केंद्र में हो।

2.  उस राशि का उच्च-स्वामी केंद्र में हो।

3.  नीच ग्रह स्वयं उच्च राशि के स्वामी के साथ हो।

4.  नीच ग्रह और उसके स्वामी दोनों केंद्र में हों।

जब ये शर्तें पूरी होती हैं तो “नीचभंग राजयोग” बनता है – राजा बनने वाला योग।

वास्तविकता: केवल शर्त पूरी होने से राजयोग नहीं बन जाता। दशा, गोचर, नवांश, दृष्टि और अन्य ग्रहों का सहयोग भी जरूरी है। बहुत बार “कागजी राजयोग” बन जाता है – नाम तो राजयोग, लेकिन फल साधारण। फिर भी सच्चाई यह है कि नीचभंग वाला ग्रह साधारण नीच ग्रह से कहीं अधिक शक्तिशाली साबित होता है।

४. नीच ग्रह पर शुभ दृष्टि या बल मिलने पर फल में परिवर्तन

यहाँ जादू होता है!

•  गुरु या शुक्र की दृष्टि नीच ग्रह पर → कष्ट बहुत कम, फल शुभ।

•  स्वक्षेत्री या उच्चांश नवांश में हो → “नीच” नाम मात्र का रह जाता है।

•  वर्गोत्तम या पुष्करांश में हो → नीचत्व लगभग समाप्त।

•  मित्र राशि के स्वामी की दृष्टि → ग्रह “अर्ध-नीच” बन जाता है।

उदाहरण: अगर शनि नीच (मेष) हो लेकिन गुरु की दृष्टि में और अपनी उच्च राशि के स्वामी (शुक्र) के केंद्र में हो, तो वह व्यक्ति मेहनत से अमीर बन सकता है।

५. दशा में नीच ग्रह के अनुभव – संघर्ष, सीख और परिपक्वता

जब नीच ग्रह की दशा/अंतर्दशा चलती है तो पहले १-२ वर्ष कष्ट, अपमान, स्वास्थ्य समस्या या आर्थिक तंगी आती है। लेकिन यही काल परिपक्वता का काल भी है।

•  व्यक्ति अपनी कमजोरियों को पहचानता है।

•  पुरानी गलतियों से सीखता है।

•  अंत में मजबूत, समझदार और सफल निकलता है।

जैसे शनि की नीच दशा में व्यक्ति “संतोष” सीखता है, राहु-केतु की नीच दशा में “वैराग्य” और “आध्यात्मिक उन्नति”। कई ज्योतिषी कहते हैं – “नीच ग्रह की दशा व्यक्ति को तोड़ती नहीं, ढालती है।”

अंतिम विचार

नीच ग्रह सदैव दुर्बल और अशुभ नहीं होते। वे चुनौती देते हैं, सीख देते हैं और विशेष परिस्थिति में राजसी फल भी दे सकते हैं।

विद्वान ज्योतिषी कुंडली देखकर यही बताता है – “यह नीच ग्रह आपको गिराने नहीं, उड़ाने आया है… बस सही समय और सही दृष्टि का इंतजार है।”


 शास्त्रीय आधार देने के लिए कुछ प्रसिद्ध ग्रंथों से संबंधित सूत्र/श्लोक प्रस्तुत कर रहा हूँ।

१. बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (नीच ग्रह का सिद्धांत)

“नीचस्थोऽपि ग्रहः शुभदृष्ट्या बलवान् भवति ध्रुवम्।”

अर्थ:

यदि कोई ग्रह नीच राशि में हो, पर उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि या सहयोग हो, तो वह बल प्राप्त कर सकता है और शुभ फल भी दे सकता है।

यह सिद्धांत बताता है कि केवल नीचत्व देखकर निर्णय करना उचित नहीं है।

२. फलदीपिका – नीचभंग का संकेत

“नीचस्थोऽपि ग्रहः केन्द्रे स्वोच्चनाथसमन्वितः।

राजयोगं प्रयच्छेत् स्यात् नीचभंगः स उच्यते॥”

अर्थ:

यदि नीच ग्रह केंद्र में हो और उसका संबंध उस ग्रह से बने जो उसकी उच्च राशि का स्वामी है, तो वह नीचत्व भंग होकर राजयोग देने में सक्षम हो सकता है।

यही सिद्धांत नीचभंग राजयोग का मूल आधार है।

३. जातक पारिजात – नीच ग्रह का परिवर्तित फल

“नीचो ग्रहः शुभदृष्टः शुभयोगसमन्वितः।

फलानि शुभदान्येव ददाति नात्र संशयः॥”

अर्थ:

यदि नीच ग्रह पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो या वह शुभ योगों से संबंधित हो, तो वह भी शुभ फल दे सकता है।


४. फलदीपिका – ग्रह बल का महत्व

“स्वोच्चस्वक्षेत्रसंयुक्तो मित्रराशिगतः ग्रहः।

बलवान् शुभदः प्रोक्तो नीचोऽपि बलसंयुतः॥”

अर्थ:

यदि ग्रह किसी प्रकार से बल प्राप्त कर ले (स्वक्षेत्र, मित्र राशि, शुभ दृष्टि आदि से), तो वह नीच होने पर भी शुभ फल देने की क्षमता रखता है।


जय श्री श्याम 


शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

सबके दाता राम- मलूकदास जी की कथा

मलूकदास जी कर्मयोगी संत थे. स्वाध्याय, सत्संग व भ्रमण से उन्होंने जो व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया उसका मुकाबला किताबी ज्ञान नहीं कर सकता. औरंगजेब जैसा पशुवत मनुष्य भी उनके सत्संग का सम्मान करता था.

शुरू में संत मलूकदास जी नास्तिक थे. उनके गांव में एक साधु आए और आकर टिक गए. साधुजी लोगों को रामायण सुनाते थे. प्रतिदिन सुबह-शाम गांव वाले उनका दर्शन करते और उनसे राम कथा का आनंद लेते.

संयोग से एक दिन मलूकदास भी राम कथा में पहुंचे. उस समय साधु महाराजा ग्रामीणों को श्रीराम की महिमा बताते कह रहे थे- श्रीराम संसार के सबसे बड़े दाता है. वह भूखों को अन्न, नंगों को वस्त्र और आश्रयहीनों को आश्रय देते हैं.

मलूकदास ने भी साधु की यह बात सुनी पर उनके पल्ले नहीं पड़ी. उन्होंने अपना विरोध जताते तर्क किया- क्षमा करे महात्मन ! यदि मैं चुपचाप बैठकर राम का नाम लूं, कोई काम न करूं, तब भी क्या राम भोजन देंगे ?

साधु ने पूरे विश्वास के साथ कहा- अवश्य देंगे. उनकी दृढता से मलूकदास के मन में एक और प्रश्न उभरा तो पूछ बैठे- यदि मैं घनघोर जंगल में अकेला बैठ जाऊं, तब ? साधु ने दृढ़ता के साथ कहा- तब भी श्रीराम भोजन देंगे !

बात मलूकदास को लग गई. अब तो श्रीराम की दानशीलता की परीक्षा ही लेनी है. पहुंच गए जंगल में और एक घने पेड़ के ऊपर चढ़कर बैठ गए. चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पेड़ थे. कंटीली झाड़ियां थीं. दूर-दूर तक फैले जंगल में धीरे-धीरे खिसकता हुआ सूर्य पश्चिम की पहाड़ियों के पीछे छुप गया. 

चारों तरफ अंधेरा फैल गया, मगर न मलूकदास को भोजन मिला, न वह पेड़ से ही उतरे. सारी रात बैठे रहे.

अगले दिन दूसरे पहर घोर सन्नाटे में मलूकदास को घोड़ों की टापों की आवाज सुनाई पड़ी. वह सतर्क होकर बैठ गए. थोड़ी देर में कुछ राजकीय अधिकारी उधर आते हुए दिखे. वे सब उसी पेड़ के नीचे घोड़ों से उतर पड़े. उन्होंने भोजन का मन बनाया. 

उसी समय जब एक अधिकारी थैले से भोजन का डिब्बा निकाल रहा था, शेर की जबर्दस्त दहाड़ सुनाई पड़ी. दहाड़ का सुनना था कि घोड़े बिदककर भाग गए.

अधिकारियों ने पहले तो स्तब्ध होकर एक-दूसरे को देखा, फिर भोजन छोड़ कर वे भी भाग गए. मलूकदास पेड़ से ये सब देख रहे थे. वह शेर की प्रतीक्षा करने लगे. मगर दहाड़ता हुआ शेर दूसरी तरफ चला गया.

मलूकदास को लगा, श्रीराम ने उसकी सुन ली है अन्यथा इस घनघोर जंगल में भोजन कैसे पहुंचता ? मगर मलूकदास तो मलूकदास ठहरे. उतरकर भला स्वयं भोजन क्यों करने लगे ! वह तो भगवान श्रीराम को परख रहे थे.

तीसरे पहर में डाकुओं का एक बड़ा दल उधर से गुजरा. पेड़ के नीचे चमकदार चांदी के बर्तनों में विभिन्न प्रकार के व्यंजनों के रूप में पड़े भोजन को देख कर डाकू ठिठक गए.

डाकुओं के सरदार ने कहा- भगवान श्रीराम की लीला देखो. हम लोग भूखे हैं और भोजन की प्रार्थना कर रहे थे. इस निर्जन वन में सुंदर डिब्बों में भोजन भेज दिया. इसे खा लिया जाए तो आगे बढ़ें.

मलूकदास को हैरानी हुई कि डाकू भी श्रीराम पर इतनी आस्था रखते हैं कि वह भोजन भेजेंगे. वह यह सब सोच ही रहे थे कि उन्हें डाकुओं की बात में कुछ शंका सुनाई पड़ी.

डाकू स्वभावतः शकी होते हैं. एक साथी ने सावधान किया- सरदार, इस सुनसान जंगल में इतने सजे-धजे तरीके से सुंदर बर्तनों में भोजन का मिलना मुझे तो रहस्यमय लग रहा है. कहीं इसमें विष न हो.

यह सुनकर सरदार बोला- तब तो भोजन लाने वाला आस पास ही कहीं छिपा होगा. पहले उसे तलाशा जाए. सरदार के आदेश पर डाकू इधर-उधर तलाशने लगे. तभी एक डाकू की नजर मलूकदास पर पड़ी.

उसने सरदार को बताया. सरदार ने सिर उठाकर मलूकदास को देखा तो उसकी आंखें अंगारों की तरह लाल हो गईं. उसने घुड़ककर कहा- दुष्ट ! भोजन में विष मिलाकर तू ऊपर बैठा है ! चल उतर.

सरदार की कड़कती आवाज सुनकर मलूकदास डर गए मगर उतरे नहीं. वहीं से बोले- व्यर्थ दोष क्यों मंढ़ते हो ? भोजन में विष नहीं है. सरदार ने आदेश दिया- पहले पेड़ पर चढ़कर इसे भोजन कराओ. झूठ-सच का पता अभी चल जाता है.

आनन-फानन में तीन-चार डाकू भोजन का डिब्बा उठाए पेड़ पर चढ़ गए और छुरा दिखा कर मलूकदास को खाने के लिए विवश कर दिया. मलूकदास ने स्वादिष्ट भोजन कर लिया. फिर नीचे उतरकर डाकुओं को पूरा किस्सा सुनाया.

डाकुओं ने उन्हें छोड़ दिया. वह स्वयं भोजन से भाग रहे थे लेकिन प्रभु की माया ऐसी रही कि उन्हें बलात भोजन करा दिया. इस घटना के बाद मलूकदास ईश्वर पक्के भक्त हो गए.

गांव लौटकर मलूकदास ने सर्वप्रथम एक दोहा लिखा–

अजगर करे न चाकरी

पंछी करे न काम,

दास मलूका कह गए

सबके दाता राम॥

यह दोहा आज खूब सुनाया जाता है. आपके कर्म शुद्ध हैं. आपने कभी किसी का अहित करने की मंशा नहीं रखी तो ईश्वर आपके साथ सबसे ज्यादा प्रेमपूर्ण भाव रखते हैं, चाहे आप उन्हें भजें या न भजें.

आपके कर्म अच्छे हैं तो आप यदि मलूकदास जी की तरह प्रभु की परीक्षा लेने लगे तो भी वह इसका बुरा नहीं मानते. आपके सत्कर्मों का सम्मान करते स्वयं परीक्षा देने आ जाते हैं. छोटे-बड़े की भावना ईश्वर में नहीं होती. ये विकार तो मनुष्य को क्षीण करते हैं।

 श्री राम जय राम जय जय राम

शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

सप्तम भाव- शादी चलेगी या नही?



कुंडली में शनि की स्थिति और विवाह उपाय 

शादी होना और शादी चलना यह दो अलग अलग बात है, कई बर ऐसी स्थिति पति-पत्नी के बीच बन जाती है कि शादी का रिश्ता टूटने की स्थिति में आ जाता है और बात तलाक आदि तक पहुँच जाती है।आज इसी विषय पर बात करते हैं यदि पति-पत्नी के बीच दूरियां हो गई है तो क्या शादी सही होकर चल पाएगी या नही और कैसे ठीक होगी?                                शादी में पति-पत्नी के बीच तब ही दूरियां बनती है मतलब अलग होने जैसी स्थितियां या तलाक आदि जैसी स्थितियां बनती है जब कुंडली का सातवाँ भाव(शादी भाव) और इसका स्वामी आदि पाप/अशुभ ग्रहों जैसे शनि राहु केतु मंगल/छठे आठवे बारहवे भाव स्वामियों या अस्त होकर बैठे अशुभ ग्रहों से दूषित होता है।तब इन पाप और अशुभ ग्रहों का 7वे भाव या 7वे भाव स्वामी या 7वे भाव-7वे भाव स्वामी दोनों पर इनका अशुभ प्रभाव पड़ता है लेकिन यदि सातवे भाव की स्थिति कही न कही शुभ और बलवान हुई, शुभ और अनुकूल ग्रहों का प्रभाव सातवे भाव/सातवे भाव स्वामी पर हुआ मतलब शादी चलने की स्थिति कुंडली मे है तो जो ग्रह वैवाहिक जीवन मे दिक्कत कर रहे है उनके उपाय करने के बाद शादी सही चलने लगती है और वैवाहिक जीवन सुखमय होने लगेगा।कैसे अब इस बात को उदाहरणो से समझते है कि शादी कैसी चल पाएगी, कैसे वैवाहिक जीवन मे दूरियां आदि होने पर वैवाहिक जीवन सुख से चल पाएगा?                                                          उदाहरण अनुसार मेष लग्न 1:- मेष लग्न में सातवें भाव का स्वामी शुक्र बनता है अब शुक्र के साथ राहु बैठा हो और कही न कही राहु या अन्य किसी पाप ग्रह जैसे शनि मंगल या केतु में से किसी का प्रभाव हो या तब शादी के बाद पति पत्नी में दूरियां जैसी स्थितिया ,वैवाहिक जीवन मे परेशानियां जैसी स्थितियां बनेगी, लेकिन अब विवाह स्वामी शुक्र यहां भाग्य स्वामी शुभ ग्रह बृहस्पति के साथ हो और गुरु की दृष्टि भी 7वे भाव पर पड़े तब शादी उपाय करने से ठीक हो जाएगी, परेशानियां जो भी विवाह सम्बन्धी होगी खत्म हो जाएगी दिक्कत करने वाले ग्रहों के शांति के उपाय करने से।                                                       

उदाहरण अनुसार कर्क लग्न 2:- कर्क लग्न में सातवें भाव(विवाह भाव)स्वामी शनि बनता है अब शादी यहाँ अस्त होकर रह केतु के साथ बैठा हो और सातवाँ भाव भी थोड़ा कमजोर हो तब वैवाहिक जीवन तलाक को ओर जाएगा, पति पत्नी में दूरियां बढ़ेगी, वैचारिक मतभेद आदि के कारण, लेकिन यही ऐसी स्थिति में सातवें भाव का स्वामी शनि जो राहु केतु के साथ है उस शनि के साथ गुरु शुक्र जैसी शुभ ग्रह भी बैठे हो तब शादी खण्डित नही होगी भले ही दूरियां हो जाये पति पत्नी में, अब यहां जो ग्रह दूरियां और दिक्कत कर रहे है उनकी शांति के उपाय करके शादी यहाँ पूरी तरह सही हो जाएगी क्योंकि सातवे भाव स्वामी शनि के साथ विवाह सुख के कारक दो शुभ ग्रह साथ बैठे है।                                                                    अब एक उदाहरण से समझते है कब शादी ठीक नही हो सकती या वैवाहिक जीवन मे पति पत्नी में दूरियां होने के बाद कब शादी नही सही हो सकती?                                         उदाहरण अनुसार कुंभ लग्न 3:- कुंभ लग्न में सातवें भाव का स्वामी सूर्य होता है ,अब सूर्य के साथ सूर्य का परम शत्रु राहु साथ बैठा हो और सातवें भाव मे कोई अस्त या छठे भाव का स्वामी यहाँ कुंभ लग्न में चन्द्रमा होता है यह सातवे भाव मे अस्त होकर या बहुत कमजोर होकर बैठे और सूर्य+सातवे भाव पर शुक्र+बुध या, गुरु प्रभाव ऐसी स्थिति में न हो तब यहां शादी नही चल पाएगी, तलाक या बिना तलाक अलग रहना पड़ेगा।                                                                          इस तरह यदि वैवाहिक जीवन मे दूरियां, दोनो पति पत्नी आपस मे अलग है, पति पत्नी आपस मे न बनने के कारण, वैचारिक मतभेद आदि के कारण तब यदि कुंडली में बचाब के योग है तब उपायों से ऐसी स्थिति में शादी बच जाएगी, वरना दोनों का तलाक होगा।

शनिवार, 30 दिसंबर 2023

पार्थिव श्रीगणेश पूजन का महत्त्व


अलग अलग कामनाओ की पूर्ति के लिए अलग अलग द्रव्यों से बने हुए गणपति की स्थापना की जाती हैं।


(1) श्री गणेश-  मिट्टी के पार्थिव श्री गणेश बनाकर पूजन करने से सर्व कार्य सिद्धि होती हे!                         


(2) हेरम्ब-  गुड़ के गणेश जी बनाकर पूजन करने से लक्ष्मी प्राप्ति होती हे। 

                                         

(3) वाक्पति-  भोजपत्र पर केसर से पर श्री गणेश प्रतिमा चित्र बनाकर।  पूजन करने से विद्या प्राप्ति होती हे।


 (4) उच्चिष्ठ गणेश-  लाख के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से स्त्री।  सुख और स्त्री को पतिसुख प्राप्त होता हे घर में ग्रह क्लेश निवारण होता हे। 


(5) कलहप्रिय-  नमक की डली या। नमक  के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से शत्रुओ में क्षोभ उतपन्न होता हे वह आपस में ही झगड़ने लगते हे। 


(6) गोबरगणेश-  गोबर के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से पशुधन में व्रद्धि होती हे और पशुओ की बीमारिया नष्ट होती है (गोबर केवल गौ माता का ही हो)।

                           

(7) श्वेतार्क श्री गणेश-  सफेद आक मन्दार की जड़ के श्री गणेश जी बनाकर पूजन करने से भूमि लाभ भवन लाभ होता हे। 

                       

(8) शत्रुंजय-  कडूए नीम की की लकड़ी से गणेश जी बनाकर पूजन करने से शत्रुनाश होता हे और युद्ध में विजय होती हे।

                           

(9) हरिद्रा गणेश-  हल्दी की जड़ से या आटे में हल्दी मिलाकर श्री गणेश प्रतिमा बनाकर पूजन करने से विवाह में आने वाली हर बाधा नष्ठ होती हे और स्तम्भन होता हे।


(10) सन्तान गणेश-  मक्खन के श्री गणेश जी बनाकर पूजन से सन्तान प्राप्ति के योग निर्मित होते हैं।


(11) धान्यगणेश- सप्तधान्य को पीसकर उनके श्रीगणेश जी बनाकर आराधना करने से धान्य व्रद्धि होती हे अन्नपूर्णा माँ प्रसन्न होती हैं।    


(12) महागणेश-  लाल चन्दन की लकड़ी से दशभुजा वाले श्री गणेश जी प्रतिमा निर्माण कर के पूजन से राज राजेश्वरी श्री आद्याकालीका की शरणागति प्राप्त होती हैं।

रविवार, 13 अगस्त 2023

१) जन्म कुंडली के केन्द्र भावों में यदि कोई ग्रह न हो (केंद्र भाव खाली हों) तो उसका फलित कैसे किया जाता है? २) जन्म कुंडली के केन्द्र भावों में यदि पाप ग्रह ही हों या सिर्फ़ पाप ग्रहों का ही प्रभाव दृष्टिगत हो तो उसका फलित कैसे किया जाता है?

केंद्र के स्वामी अपने स्वभाव को भूल जाते हैं और जैसे स्वभाव वाले ग्रह से संबंध हो वैसा फल देते हैं। त्रिकोण में हो यह त्रिकोण के स्वामी के साथ संबंध होने पर फल विशेष शुभ हो जाता है। यदि किसी दूसरे पाप स्थान 3,6,8,12 में हो या उनके स्वामी के साथ हो जैसे 3,6,8,12 के स्वामी के साथ संबंध हो जाए तो सामान्य रूप से फल देता है। 

शुभ ग्रह गुरु शुक्र केंद्रेश हैं, तो बुरे हैं। परंतु बुध केंद्रेश हो तो शुक्र की अपेक्षा कम बुराई करेगा। चंद्र केंद्रेश हो तो बुध से कम बुराई करेगा अर्थात चंद्र बुध शुक्र गुरु उत्तरोत्तर बुराई में बुरे हैं। 

स्वभाविक पाप ग्रह यदि केंद्रेश होकर त्रिषडाय (3-6-11) के भी स्वामी हो जाएं तो पाप कारक हो जाते हैं। 

पाप ग्रहों के केंद्रेश होने में इतना शुभत्व आ जाता है कि वह अपने पाप फल को नहीं देता यदि वह उस समय त्रिकोणेश भी हो जावे तो उसे शुभ फल देने का बल आ जाता है। 

जन्म कुंडली के केंद्र भावों में यदि पाप ग्रह ही हो या सिर्फ पाप ग्रहों का प्रभाव दृष्टिगत हो तो इसका फलित कैसे किया जाता है

1,4,7,10 स्थान क्रम से उत्तरोत्तर बली है। जैसे:- पाप ग्रह 1,4 भाव का स्वामी हो जाए तो लग्न की अपेक्षा चतुर्थेश शुभ फल देने में अधिक बली होगा। 

शनि की राशि 10,11 लग्न में हो और शनी उसे देख रहा हो तो लग्न बली हो जाता है। और शनी अपनी दशा अंतर्दशा में शुभ फल देता है। 

केंद्र में पाप ग्रह अशुभ फल देते हैं और आयु कम करते हैं। 


 कुंडली के केंद्र भावों में यदि कोई ग्रह न हो (केन्द्र भाव खाली हों ) तो उसका फलित निम्नानुसार भी किया जाता है :---

1केन्द्र भाव लग्न, चतुर्थ, सप्तम तथा दशम भाव होते हैं। प्रथम भाव, चतुर्थ भाव, सप्तम भाव तथा दशम भाव होते हैं। इन चारों भावों मे जो--जो राशि है,  उस राशि का स्वामी ग्रह जिन जिन भावों में स्थित होते हैं उनके अनुसार केन्द्र के भावों का फलित किया जाता है। यदि केन्द्र में स्थित राशि का स्वामी ग्रह यदि त्रिकोण भाव में स्थित हो तो शुभ फल प्राप्त होता  है। यदि केन्द्र में स्थित राशि का स्वामी ग्रह षष्ट, अष्ठम या द्वादश भाव मे स्थित हो तो शुभ फल मे कमी आयेगी । 

*केन्द्र के भावों मे लग्न, चतुर्थ, सप्तम दशम भाव पर जिस ग्रह की दृष्टि होती है के अनुसार भी केन्द्र के भाव का फलित किया जाता है। 

2-जन्म कुंडली के केन्द्र भावो मे यदि पाप ग्रह हो तो वह अपना पाप फल स्थगित कर देंगे। जैसे तुला लग्न की कुंडली में मंगल सप्तमेश है और द्वितीयेश भी है। द्वितीयेश होकर सम है और सप्तमेश होकर अपना अशुभ फल स्थगित कर देगा। इसलिए तुला लग्न में मंगल मारक का फल नहीं देता है। 

यदि केन्द्र में स्थित भावों पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो पाप ग्रह की स्थिति के अनुसार फलित बताना चाहिए ।केन्द्र मे स्थित भाव मे स्थित राशि और दृष्टि डालने वाले  पाप ग्रह किस भाव का स्वामी ग्रह है तथा लग्नेश का मित्र है या शत्रु है या सम भाव रखता है।  जिस भाव पर दृष्टि डाल रहा है उस भाव मे स्थित राशि से दृष्टि डालने वाले पाप ग्रह के मध्य मित्रता है या शत्रुताहै या सम भाव रखता है के अनुसार फलप्राप्त होगा।

शनिवार, 6 मई 2023

श्री श्याम ज्योतिष संस्थान : एक सूचना

 1 .आप सभी शुभचिंतको को सूचित किया जाता है की कल दिनांक 07/05/2023से इस ज्योतिष ब्लॉग हर रविवार को श्याम 4:00 pm से 5:00 pmके बीच सक्रिय रहूँगा | उस समय आप ब्लॉग  पर टिप्पणी के जरिये मुझसे संपर्क साध सकते है |मेरे द्वारा सभी को जवाब देने का प्रयास रहेगा |

2. रविवार के दिन ही निशुल्क परामर्श के लिए प्रातः 8:00 से 9:00 बजे के बीच ही whatsapp नंबर 9782316887 पर मेसेज करना होगा |आपके मेसेज में नाम ,जन्म दिनांक ,जन्म समय और जन्म स्थान बताना होगा और साथ में कोई कुंडली हो तो वो भी सेंड कर सकते है | अपना एक प्रश्न भी लिखना होगा जिसका आप जवाब चाहते है |याद रहे सिर्फ एक प्रश्न |अतिरिक्त प्रश्न के लिए आपको फीस देनी होगी |

3.प्रथम दो मेसेज करने वाले संपर्ककर्ताओ को परामर्श निशुल्क दिया जाएगा |बाकि संपर्ककर्ताओं को न्यूनतम फीस के द्वारा परामर्श दिया जाएगा |परामर्श शुल्क मुख्य फीस से 50% कम 251रुपये होगा |

4. जो भी व्यक्ति रविवार को संपर्क करता है  प्रातः 8:00 से 9:00 बजे के बीच में उसे ही यह लाभ दिया जाएगा |

5 .मेरे द्वारा परामर्श देने का समय श्याम 4.00से 5.00 बजे तक ही होगा |इस दौरान यदि सभी के जवाब नहीं दे पाया तो अगले दिन उनसे संपर्क कर के ही जरुर जवाब दिया जाएगा |

6 परामर्श का निर्धारित शुल्क पहले ही जमा करना होगा |शुल्क के बारे में जानकारी ब्लॉग पर पूर्व में ही मेरे द्वारा बताया जा चुका है | 

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2021

श्री श्याम ज्योतिष संस्थान : ज्योतिषीय उपाय के लिए सदा आपके साथ

 जीवन में उतार चढाव आते रहते है | किसी भी समस्या का ज्योतिषीय कारण और उपाय के लिए मुझे आप 9782316887 पर व्हाट्स अप करे या मुझे कॉल करें | मेरी फीस 501 रुपये है | पहले पूरी फीस मुझे किसी भी माध्यम से phone pay , google pay या  pay tm करे ,फीस जमा की रशीद भी डाले | थोडा समय दे निश्चित आपकी समस्या का समाधान किया जाएगा |

                                                                     ज्योतिषी रवि व्यास |

सोमवार, 3 जून 2019

केमद्रुम योग

॥ केमद्रुमे मलिन दुःखितनीचनिस्वो नृपजोपी ॥

केमद्रुम योग में जन्म हो तो राजा के यहाँ  जन्म पाया हुआ मनुष्य भी मलिन स्वभाव का वा मैला रहने वाला, दुःखी नीच प्रकृति वाला नीच दर्जे का और निर्धन मनुष्य होता है अर्थात्  साधारण मनुष्य के भंग रहित यह योग हो तो वह दरिद्री हुए बिना नहीं रहता।
यदि चन्द्रमा के दोनों तरफ़ कोई ग्रह न हो तो केमद्रुम योग बनता है। जिसके फलस्वरूप जातक गन्दा दुःखी, अनुचित काम करने वाला, ग़रीब, दूसरे पर निर्भर, दुष्ट और ठग होगा।

एक मान्यता यह भी है कि जन्म लग्न या चन्द्रमा से केन्द्र में ग्रह हों या चन्द्रमा किसी ग्रह से युक्त हो तो केमद्रुम योग नहीं बनता।
कुछ अन्य का मत है कि योग केन्द्र और नवांश से बनते हैं जो कि सामान्यतः स्वीकार्य नहीं है। वाराहमिहिर इस बात पर जोर देते हैं कि राजकीय परिवारों में पैदा होने वाले जातकों की कुंडली में इस प्रकार के योग बनते हों तो उनके मामले में साधारण परिवारों में पैदा होने वाले जातकों की अपेक्षा अधिक दुर्भाग्य की भविष्यवाणी करनी चाहिये।
दुःख का अर्थ शारीरिक तथा मानसिक दुःख होता  है। मूलतः नीच शब्द का प्रयोग किया जाता है और इससे ऐसे कार्यों का सम्बन्ध होता है जो धर्म, नैतिकता और सामाजिक व्यवस्था में मना है और इसे अपमानजनक माना जाता है।

केमद्रुम योग के भेद

केमद्रुम योग केवल चन्द्र के व्यय दूसरे स्थान में कोई भी ग्रह नहीं होने से ही होता है ऐसा नहीं है। जातक पारिजात में केमद्रुम के १३ भेद बताये हैं इनमे से कोई भी एक प्रकार का योग हो तो केमद्रुम योग हो जाता है।
 यह भेद इस प्रकार से हैं :-

1 लग्न में किंवा सप्तम में चन्द्रमा गया हो और उस पर गुरु की दृष्टि न हो तो केमद्रुम योग होता है। सर्वग्रह बलहीन व अष्टकवर्ग में ४ बिंदु से युक्त हो तो यह योग बलवान हो जाता है।
2 चन्द्रमा सूर्य से युत हो के नीच राशि में गये हुए ग्रह से दृष्ट हो और पापग्रह के नवांश में गया हो तो दरिद्र योग होता है।
3 क्षीण चन्द्रमा अष्टम स्थान में स्थित होकर पापग्रह से दृष्ट किंवा युत हो और रात्रि समय में जन्म हो तो केमद्रुम योग होता है।
4 चन्द्रमा राहु आदि पापग्रहों से पीड़ित होकर पापग्रहों से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग होता है।
5 लग्न से किंवा चन्द्रमा से चारों केन्द्र स्थान में पापग्रह गयें हों तो केमद्रुम योग बनता है।
6 चन्द्र पर बलहीन पराजित शुभग्रहों की दृष्टि हो और जन्म लग्न राहु आदि पापग्रहों से पीड़ित हो तो केमद्रुम योग होता है।
7 तुला राशि का चन्द्रमा शत्रुग्रह की राशि के वर्ग में हो और नीच तथा शत्रु राशि में गए हुए ग्रह से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग होता है।
8 नीच किंवा शत्रु राशिगत चन्द्रमा १, ४, ७, १० किंवा ९, ५ भाव में गया हो और चन्द्रमा से ६, ८, १२ वे स्थान में गुरु गया हो तो दरिद्र योग होता है।
9 चर राशि में चर राशि के ही नवमांश में गया हुआ चन्द्रमा पापग्रह के नवमांश में हो और अपने शत्रुग्रह से दृष्ट हो गुरु की दृष्टि से रहित हो तो महादरिद्र योग होता है।
10 नीच शत्रु पापग्रह की राशि नवांशादि वर्ग में गए हुए शनि शुक्र एक राशि से युक्त हो किंवा परस्पर दृष्ट हो तो केमद्रुम योग होता है। इस योग में राजवंश में जन्म पाया हुआ भी दरिद्री होता है।
11 पापग्रह की राशि में गया हुआ निर्बल चन्द्रमा पापग्रह से युक्त हो और पापग्रह के ही नवमांश में गया हो और रात्रि समय का जन्म हो तथा उसको दशमेश देखता हो तो केमद्रुम योग होता है।
12 नीच राशि के नवमांश में गया हुआ चन्द्रमा पाप ग्रह से युक्त हो के नवमेश से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग होता है।
13 रात्रि समय का जन्म हो और क्षीण चन्द्रमा नीच राशि में गया हुआ हो तो केमद्रुम योग होता है।
जिनके जन्म काल में ये दरिद्र योग [केमद्रुम] होता है उनका राजयोग भंग होता है।

केमद्रुम भंग योग -

1 जातक पारिजात में लिखा है। जिनके समय में
चन्द्रमा अथवा शुक्र केंद्र स्थान में स्थित हो और गुरु से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग का भंग [दरिद्र योग नहीं] करता है। 
2 चन्द्रमा शुभग्रह से युत हो अथवा शुभग्रहों के मध्य में गया हो और गुरु से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग नहीं होता है।
3 चन्द्रमा अधि मित्र राशि का किंवा अपनी उच्च राशि का हो अथवा अधिमित्र तथा अपनी उच्चराशि के नवमांश में गया हो और गुरु से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग नहीं होता है।
4 पूर्ण चन्द्रमा शुभ ग्रह से युत होकर बुध की उच्चराशि में गया हो और गुरु से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग नहीं होता है।
5 चन्द्रमा सर्व ग्रहों से दृष्ट हो तो केमद्रुम योग का वहन भंग करता है।  

मंगलवार, 22 जनवरी 2019

सर्वार्थ सिद्धि योग

सर्वार्थ सिद्धि योग अत्यंत शुभ योग माना जाता है। यह तीन शब्दों से मिलकर बना है। सर्वार्थ यानि सभी, सिद्धि यानि लाभ व प्राप्ति एवं योग से तात्पर्य संयोजन, अत: हर प्रकार से लाभ की प्राप्ति को ही सर्वार्थ सिद्धि योग कहा गया है। यह एक शुभ योग है इसलिए इस योग में संपन्न होने वाले कार्यों से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

सर्वार्थ सिद्धि योग एक निश्चित वार और निश्चित नक्षत्र के संयोग से बनता है। यह योग शुभ कार्यों की शुरुआत के लिए विशेष फलदायी होता है और समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करता है। वार और नक्षत्र के ये संयोग हमेशा निर्धारित रहते हैं। सर्वार्थ सिद्धि योग सभी शुभ कार्यों के शुभारंभ के लिए उपयुक्त समय होता है।

नक्षत्र और वार के संयोग जिनमें सर्वार्थ सिद्धि योग निर्मित होते हैं :

1.  रविवार- अश्विनी, हस्त, पुष्य, मूल, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद

2.  सोमवार- श्रवण, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, अनुराधा

3.  मंगलवार- अश्विनी, उत्तरा भाद्रपद, कृतिका, अश्लेषा

4.  बुधवार- रोहिणी, अनुराधा, हस्त, कृतिका, मृगशिरा

5.  गुरुवार- रेवती, अनुराधा, अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य

6.  शुक्रवार- रेवती, अनुराधा, अश्विनी, पुनर्वसु, श्रवण

7.  शनिवार- श्रवण, रोहिणी, स्वाति

सर्वार्थ सिद्धि योग किसी भी नए तरह का करार करने का सबसे अच्छा समय होता है। इस योग के प्रभाव से नौकरी, परीक्षा, चुनाव, खरीदी-बिक्री से जुड़े कार्यों में सफलता मिलती है। भूमि, गहने और कपड़ों की ख़रीददारी में सर्वार्थ सिद्धि योग अत्यंत लाभकारी है। इसके प्रभाव से मृत्यु योग जैसे कष्टकारी योग के दुष्प्रभाव भी नष्ट हो जाते हैं। सर्वार्थ सिद्धि योग में हर वस्तु की खरीददारी शुभ मानी जाती है लेकिन मंगलवार के दिन नए वाहन और शनिवार के दिन इस योग में लोहे का सामान खरीदना अशुभ माना जाता है। सर्वार्थ सिद्धि योग को एक शुभ योग की संज्ञा दी गई है। यह योग एक ऐसा सुनहरा अवसर लेकर आता है जिसके प्रभाव से आपकी समस्त इच्छा और सपने पूर्ण होते हैं।

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

वास्तु के अनुसार कैसा हो घर?

1.घर का मुख्य द्वार चार ईशान, उत्तर, पूर्व और पश्चिम में से किसी एक दिशा में हो।

2.घर के सामने आँगन और पीछे भी आँगन हो जिसके बीच में तुलसी का एक पौधा लगा हो।

3.घर के सामने या निकट तिराहा-चौराह नहीं होना चाहिए।

4.घर का दरवाजा दो पल्लों का होना चाहिए। अर्थात बीच में से भीतर खुलने वाला हो। दरवाजे की दीवार के दाएँ शुभ और बाएँ लाभ लिखा हो।

5.घर के प्रवेश द्वार के ऊपर स्वस्तिक अथवा 'ॐ' की आकृति लगाएँ।

6 .घर के अंदर आग्नेय कोण में किचन, ईशान में प्रार्थना-ध्यान का कक्ष हो, नैऋत्य कोण में शौचालय, दक्षिण में भारी सामान रखने का स्थान आदि हो।

7.घर में बहुत सारे देवी-देवताओं के चित्र या मूर्ति ना रखें। घर में मंदिर ना बनाएँ।

8.घर के सारे कोने और ब्रह्म स्थान (बीच का स्थान) खाली रखें।

9.घर की छत में किसी भी प्रकार का उजालदान ना रखें।

10.घर हो मंदिर के आसपास तो घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।

11.घर में किसी भी प्रकार की नाकारात्मक वस्तुओं का संग्रह ना करें ।

12.घर में सीढ़ियाँ विषम संख्या (5,7, 9) में होनी चाहिए।

13.उत्तर, पूर्व तथा उत्तर-पूर्व (ईशान) में खुला स्थान अधिक रखना चाहिए।

14. घर के उपर केसरिया धवज लगाकर रखें।

16. घर में किसी भी तरह के नकारात्मक कांटेदार पौधे या वृक्ष रोपित ना करें।

बुधवार, 2 जनवरी 2019

शनि शुक्र दशांतर एक विचित्र नियम

कालिदास कृत उत्तरकालामृत नामक प्रसिद्द ज्योतिष ग्रन्थ में एक विचित्र नियम का उल्लेख किया गया है।
यह नियम है शनि और शुक्र का परस्पर दशांतर ।इस नियम का उत्तरकालामृत के अलावा अन्य किसी भी ज्योतिष ग्रन्थ में कोई विवरण नहीं मिलता।

इस नियम के अनुसार यदि शनि और शुक्र जन्मकुंडली में योगकारक हों और अवस्था में मृत ना हों तो अपने परस्पर दशांतर में महान दुर्भाग्य घटित कर देते हैं।यह ऐसा दशांतर होता है जो जातक को धूल चटा देता है सुख समृद्धि शांति सब हवा में उड़ जाती है जातक के चारों ओर दुखों का तांडव होने लगता है।
इस दशांतर की भयानकता तब और बढ़ जाती है जब शनि लग्न अथवा चंद्र से चतुर्थ अष्टम और दशम भाव में गोचर कर रहा हो।
लेकिन यह दोनों ग्रह जन्मकुंडली में निर्बल और पीड़ित हों नीच के हों और अवस्था में मृत हों तो परस्पर दशांतर में महान सौभाग्य प्रदान करते हैं रंक से राजा बन जाता है जातक मिट्टी को छूता है तो वह सोना बन जाती है सब तरफ से शुभ समाचार प्राप्त होने लगते हैं महा राजयोग घटित हो जाता है।
इनमें से एक निर्बली और दूसरा योगकारक हो तो परस्पर दशांतर योगकारक ग्रह की क्षमता अनुसार शुभ फल करता है।

सोमवार, 3 दिसंबर 2018

नक्षत्र,राशि व ग्रहों के लिए निर्धारित पेड़ पौधे

27 नक्षत्रो के लिए निर्धारित पेड़-पौधे
अश्विनी –           कोचिला,
भरनी –               आंवला
कृतका –             गुल्लड़
रोहिणी –             जामुन
मृगशिरा –           खैर
आद्रा –                शीशम
पुनर्वसु –              बांस
पुष्य –                  पीपल
अश्लेषा –             नागकेसर
मघा –                  बट
पूर्वा फाल्गुन –     पलास
उत्तरा फाल्गुन –  पाकड़
हस्त –                   रीठा
चित्रा –                  बेल
स्वाती-                 अजरुन
विशाखा –             कटैया
अनुराधा –            भालसरी
ज्योष्ठा –              चीर
मूला –                  शाल
पूर्वाषाढ़ –             अशोक
उत्तराषाढ़ –         कटहल
श्रवण –                 अकौन
धनिष्ठा –             शमी
शतभिषा –           कदम्ब
पूर्व भाद्र –             आम
उत्तरभाद्र –          नीम
रेवती –                 महुआ

बारह राशि के लिए निर्धारित पेड़-पौधे
राशि –      पेड़-पौधे
मेष –        आंवला
वृष –         जामुन,
मिथुन –    शीशम,
कर्क –       नागकेश्वर,
सिंह –       पलास,
कन्या –     रिट्ठा,
तुला –      अजरुन,
वृश्चिक –  भालसरी,
धनु –        जलवेतस,
मकर –     अकोन,
कुंभ –       कदम्ब
मीन –       नीम

प्रत्येक ग्रह के लिए निर्धारित पेड़ -पौधे
सूर्य –       अकोन ( एकवन)
चन्द्रमा – पलास,
मंगल – खैर,
बुद्ध –     चिरचिरी,
गुरु –      पीपल,
शुक्र –     गुलड़,
शनि –    शमी,
राहु –      दुर्वा व
केतु –     कुश

श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्र --समस्याओं का समाधान

श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्रजानिए इस चमत्कारिक यंत्र से अपनी समस्याओं का समाधान

 हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथो में कई तरह के यंत्रों के बारे में बताया गया है जैसे हनुमान प्रश्नावली चक्र, नवदुर्गा प्रश्नावली चक्र, राम श्लोकी प्रश्नावली, श्रीगणेश प्रश्नावली चक्र आदि। इन यंत्रों की सहायता से हम अपने मन में उठ रहे सवाल, हमारे जीवन में आने वाली कठिनाइयों आदि का समाधान पा सकते है। इन्ही में से एक श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्र के बारे में हम आज आपको बता रहे है।

हिंदू धर्म में भगवान श्रीगणेश को प्रथम पूज्य माना गया है अर्थात सभी मांगलिक कार्यों में सबसे पहले श्रीगणेश की ही पूजा की जाती है। श्रीगणेश की पूजा के बिना कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्र के माध्यम से आप अपने जीवन की परेशानियों व सवालों का हल आसानी से पा सकते हैं। यह बहुत ही चमत्कारी यंत्र है।

उपयोग विधि

जिसे भी अपने सवालों का जवाब या परेशानियों का हल जानना है वो पहले पांच बार ऊँ नम: शिवाय: मंत्र का जप करने के बाद 11 बार ऊँ गं गणपतयै नम: मंत्र का जप करें। इसके बाद आंखें बंद करके अपना सवाल पूछें और भगवान श्रीगणेश का स्मरण करते हुए प्रश्नावली चक्र पर कर्सर घुमाते हुए रोक दें। जिस कोष्ठक(खाने) पर कर्सर रुके, उस कोष्ठक में लिखे अंक के फलादेश को ही अपने अपने प्रश्न का उत्तर समझें।

1- आप जब भी समय मिले राम नाम का जप करें। आपकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी।

2- आप जो कार्य करना चाह रहे हैं, उसमें हानि होने की संभावना है। कोई दूसरा कार्य करने के बारे में विचार करें। गाय को चारा खिलाएं।

3- आपकी चिंता दूर होने का समय आ गया है। कष्ट मिटेंगे और सफलता मिलेगी। आप रोज पीपल की पूजा करें।

4- आपको लाभ प्राप्त होगा। परिवार में वृद्धि होगी। सुख संपत्ति प्राप्त होने के योग भी बन रहे हैं। आप कुल देवता की पूजा करें।

5- आप शनिदेव की आराधना करें। व्यापारिक यात्रा पर जाना पड़े तो घबराएं नहीं। लाभ ही होगा।

6- रोज सुबह भगवान श्रीगणेश की पूजा करें। महीने के अंत तक आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी।

7- पैसों की तंगी शीघ्र ही दूर होगी। परिवार में वृद्धि होगी। स्त्री से धन प्राप्त होगा।

8- आपको धन और संतान दोनों की प्राप्ति के योग बन रहे हैं। शनिवार को शनिदेव की पूजा करने से आपको लाभ होगा।

9- आपकी ग्रह दिशा अनुकूल चल रही है। जो वस्तु आपसे दूर चली गई है वह पुन: प्राप्त होगी।

10- शीघ्र ही आपको कोई प्रसन्नता का समाचार मिलने वाला है। आपकी मनोकामना भी पूरी होगी। प्रतिदिन पूजन करें।

11- यदि आपको व्यापार में हानि हो रही है तो कोई दूसरा व्यापार करें। पीपल पर रोज जल चढ़ाएं। सफलता मिलेगी।

12- राज्य की ओर से लाभ मिलेगा। पूर्व दिशा आपके लिए शुभ है। इस दिशा में यात्रा का योग बन सकता है। मान-सम्मान प्राप्त होगा।

13- कुछ ही दिनों बाद आपका श्रेष्ठ समय आने वाला है। कपड़े का व्यवसाय करेंगे तो बेहतर रहेगा। सब कुछ अनुकूल रहेगा।

14- जो इच्छा आपके मन में है वह पूरी होगी। राज्य की ओर से लाभ प्राप्ति का योग बन रहा है। मित्र या भाई से मिलाप होगा।

15- आपके सपने में स्वयं को गांव जाता देंखे तो शुभ समाचार मिलेगा। पुत्र से लाभ मिलेगा। धन प्राप्ति के योग भी बन रहे हैं।

16- आप देवी मां पूजा करें। मां ही सपने में आकर आपका मार्गदर्शन करेंगी। सफलता मिलेगी।

17- आपको अच्छा समय आ गया है। चिंता दूर होगी। धन एवं सुख प्राप्त होगा।

18- यात्रा पर जा सकते हैं। यात्रा मंगल, सुखद व लाभकारी रहेगी। कुलदेवी का पूजन करें।

19- आपके समस्या दूर होने में अभी करीब डेढ़ साल का समय शेष है। जो कार्य करें माता-पिता से पूछकर करें। कुल देवता व ब्राह्मण की सेवा करें।

20- शनिवार को शनिदेव का पूजन करें। गुम हुई वस्तु मिल जाएगी। धन संबंधी समस्या भी दूर हो जाएगी।

21- आप जो भी कार्य करेंगे उसमें सफलता मिलेगी। विदेश यात्रा के योग भी बन रहे हैं। आप श्रीगणेश का पूजन करें।

22- यदि आपके घर में क्लेश रहता है तो रोज भगवान की पूजा करें तथा माता-पिता की सेवा करें। आपको शांति का अनुभव होगा।

23- आपकी समस्याएं शीघ्र ही दूर होंगी। आप सिर्फ आपके काम में मन लगाएं और भगवान शंकर की पूजा करें।

24- आपके ग्रह अनुकूल नहीं है इसलिए आप रोज नवग्रहों की पूजा करें। इससे आपकी समस्याएं कम होंगी और लाभ मिलेगा।

25- पैसों की तंगी के कारण आपके घर में क्लेश हो रहा है। कुछ दिनों बाद आपकी यह समस्या दूर जाएगी। आप मां लक्ष्मी का पूजन रोज करें।

26- यदि आपके मन में नकारात्मक विचार आ रहे हैं तो उनका त्याग करें और घर में भगवान सत्यनारायण का कथा करवाएं। लाभ मिलेगा।

27- आप जो कार्य इस समय कर रहे हैं वह आपके लिए बेहतर नहीं है इसलिए किसी दूसरे कार्य के बारे में विचार करें। कुलदेवता का पूजन करें।

28- आप पीपल के वृक्ष की पूजा करें व दीपक लगाएं। आपके घर में तनाव नहीं होगा और धन लाभ भी होगा।

29- आप प्रतिदिन भगवान विष्णु, शंकर व ब्रह्मा की पूजा करें। इससे आपको मनचाही सफलता मिलेगी और घर में सुख-शांति रहेगी।

30- रविवार का व्रत एवं सूर्य पूजा करने से लाभ मिलेगा। व्यापार या नौकरी में थोड़ी सावधानी बरतें। आपको सफलता मिलेगी।

31- आपको व्यापार में लाभ होगा। घर में खुशहाली का माहौल रहेगा और सबकुछ भी ठीक रहेगा। आप छोटे बच्चों को मिठाई बांटें।

32- आप व्यर्थ की चिंता कर रहे हैं। सब कुछ ठीक हो रहा है। आपकी चिंता दूर होगी। गाय को चारा खिलाएं।

33- माता-पिता की सेवा करें, ब्राह्मण को भोजन कराएं व भगवान श्रीराम की पूजा करें। आपकी हर अभिलाषा पूरी होगी।

34- मनोकामनाएं पूरी होंगी। धन-धान्य एवं परिवार में वृद्धि होगी। कुत्ते को तेल चुपड़ी रोटी खिलाएं।

35- परिस्थितियां आपके अनुकूल नहीं है। जो भी करें सोच-समझ कर और अपने बुजुर्गो की राय लेकर ही करें। आप भगवान दत्तात्रेय का पूजन करें।

36- आप रोज भगवान श्रीगणेश को दुर्वा चढ़ाएं और पूजन करें। आपकी हर मुश्किल दूर हो जाएंगी। धैर्य बनाएं रखें।

37- आप जो कार्य कर रहे हैं वह जारी रखें। आगे जाकर आपको इसी में लाभ प्राप्त होगा। भगवान विष्णु का पूजन करें।

38- लगातार धन हानि से चिंता हो रही है तो घबराइए मत। कुछ ही दिनों में आपके लिए अनुकूल समय आने वाला है। मंगलवार को हनुमानजी को सिंदूर अर्पित करें।

39- आप भगवान सत्यनारायण की कथा करवाएं तभी आपके कष्टों का निवारण संभव है। आपको सफलता भी मिलेगी।

40- आपके लिए हनुमानजी का पूजन करना श्रेष्ठ रहेगा। खेती और व्यापार में लाभ होगा तथा हर क्षेत्र में सफलता मिलेगी।

41- आपको धन की प्राप्ति होगी। कुटुंब में वृद्धि होगी एवं चिंताएं दूर होंगी। कुलदेवी का पूजन करें।

42- आपको शीघ्र सफलता मिलने वाली है। माता-पिता व मित्रों का सहयोग मिलेगा। खर्च कम करें और गरीबों का दान करें।

43- रुका हुआ कार्य पूरा होगा। धन संबंधी समस्याएं दूर होंगी। मित्रों का सहयोग मिलेगा। सोच-समझकर फैसला लें। श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाएं।

44- धार्मिक कार्यों में मन लगाएं तथा प्रतिदिन पूजा करें। इससे आपको लाभ होगा और बिगड़ते काम बन जाएंगे।

45- धैर्य बनाएं रखें। बेकार की चिंता में समय न गवाएं। आपको मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी। ईश्वर का चिंतन करें।

46- धार्मिक यात्रा पर जाना पड़ सकता है। इसमें लाभ मिलने की संभावना है। रोज गायत्री मंत्र का जप करें।

47- प्रतिदिन सूर्य को अध्र्य दें और पूजन करें। आपको शत्रुओं का भय नहीं सताएगा। आपकी मनोकामना पूरी होगी।

48- आप जो कार्य कर रहे  हैं वही करते रहें। पुराने मित्रों से मुलाकात होगी जो आपके लिए फायदेमंद रहेगी। पीपल को रोज जल चढ़ाएं।

49- अगर आपकी समस्या आर्थिक है तो आप रोज श्रीसूक्त का पाठ करें और लक्ष्मीजी का पूजा करें। आपकी समस्या दूर होगी।

50- आपका हक आपको जरुर मिलेगा। आप घबराएं नहीं बस मन लगाकर अपना काम करें। रोज पूजा अवश्य करें।

51- आप जो व्यापार करना चाहते हैं उसी में सफलता मिलेगी। पैसों के लिए कोई गलत कार्य न करें। आप रोज जरुरतमंद लोगों को दान-पुण्य करें।

52- एक महीने के अंदर ही आपकी मुसीबतें कम हो जाएंगी और सफलता मिलने लगेगी। आप कन्याओं को भोजन कराएं।

53- यदि आप विदेश जाने के बारे में सोच रहे हैं तो अवश्य जाएं। इसी में आपको सफलता मिलेगी। आप श्रीगणेश का आराधना करें।

54- आप जो भी कार्य करें किसी से पुछ कर करें अन्यथा हानि हो सकती है। विपरीत परिस्थिति से घबराएं नहीं। सफलता अवश्य मिलेगी।

55- आप मंदिर में रोज दीपक जलाएं, इससे आपको लाभ मिलेगा और मनोकामना पूरी होगी।

56- परिजनों की बीमारी के कारण चिंतित हैं तो रोज महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। कुछ ही दिनों में आपकी यह समस्या दूर हो जाएगी।

57- आपके लिए समय अनुकूल नहीं है। अपने कार्य पर ध्यान दें। प्रमोशन के लिए रोज गाय को रोटी खिलाएं।

58- आपके भाग्य में धन-संपत्ति आदि सभी सुविधाएं हैं। थोड़ा धैर्य रखें व भगवान में आस्था रखकर लक्ष्मीजी को नारियल चढ़ाएं।

59- जो आप सोच रहे हैं वह काम जरुर पूरा होगा लेकिन इसमें किसी का सहयोग लेना पड़ सकता है। आप शनिदेव की उपासना करें।

60- आप अपने परिजनों से मनमुटाव न रखें तो ही आपको सफलता मिलेगी। रोज हनुमानजी के मंदिर में चौमुखी दीपक लगाएं।

61- यदि आप अपने करियर को लेकर चिंतित हैं तो श्रीगणेश की पूजा करने से आपको लाभ मिलेगा।

62- आप रोज शिवजी के मंदिर में जाकर एक लोटा जल चढ़ाएं और दीपक लगाएं। आपके रुके हुए काम हो जाएंगे।

63- आप जिस कार्य के बारे में जानना चाहते हैं वह शुभ नहीं है उसके बारे में सोचना बंद कर दें। नवग्रह की पूजा करने से आपको सफलता मिलेगी।

64- आप रोज आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को खिलाएं। आपकी हर समस्या का निदान स्वत: ही हो जाएगा।

रविवार, 4 नवंबर 2018

विवाह-मिलान के साथ शुभ मुहूर्त निर्धारण कैसे और क्यों करें ?

हिंदुओं में शुभ विवाह की तिथि वर-वधू की जन्म राशि के आधार पर निकाली जाती है। वर या वधू का जन्म जिस चंद्र नक्षत्र में हुआ होता है उस नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर को भी विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया जाता है। विवाह कि तिथि सदैव वर-वधू की कुंडली में गुण-मिलान करने के बाद निकाली जाती है। विवाह की तिथि तय होने के बाद कुंडलियों का मिलान नहीं किया जाता।

शादी के बंधन में बंधने जा रहे नवयुगल जोडे के लिए सात फेरों के लिए शुभ मुहुर्त का बडा महत्व है। शादी की तैयारियों, मेहमानों के स्वागत, नाच-गाने की मौज-मस्ती में शुभ मुहुर्त की अहमियत को हम अकसर समझ नहीं पाते हैं।

हमारे पूर्व जन्मों के कर्मो या इस जन्म में अनजाने में बुरे कर्म का परिणाम भोगना पडता है। ऎसी स्थिति में शुभ मुहुर्त, मंत्र जाप तथा दानादि ही रक्षा करते हैं।

ब्रह्मलीन पं. तृप्तिनारायण झा शास्त्री द्वारा रचित पुस्तक ‘विवाह-विमर्श’ पुस्तक के अनुसार उपरोक्त चरण अनिष्टकारी होते हैं। बाकी के सोलह नक्षत्र अश्विनी, भरणी, कृतिका, आद्र्रा, पुनर्वसु, पुण्य, अश्लेषा, तीनों पूर्वा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, श्रवण, घनिष्ठा तथा शतभिषा नक्षत्रों को विवाह के लिए शुभ नहीं माना जाता।

‘ज्योतिष रत्न’ पुस्तक के अनुसार कृतिका, भरणी, आद्र्रा, पुनर्वसु और अश्लेषा नक्षत्रों में विवाह होने पर कन्या छह वर्षों के अंदर ही विधवा हो जाती है। पुण्य नक्षत्र में विवाहित पुरूष अपनी पत्नी का परित्याग कर दूसरी औरत से शादी रचा लेता है। चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, तीनों पूर्वाषाढा नक्षत्र तलाक के कारण बनते हैं।

विशाखा नक्षत्र में विवाहित कन्या अपने पति का परित्याग कर दूसरे पुरूष से पुन: विवाह कर लेती है या गुपचुप यौन संबंध स्थापित करती है। श्रवण, घनिष्ठा तथा अश्विनी नक्षत्र पति-पत्नी में मनमुटाव पैदाकर उनके जीवन को कठिन बना देते हैं। अशुभ नक्षत्रों में हुए विवाह की अधिकतम आयु दस वर्षों की होती है।

नक्षत्रों के अतिरिक्त विवाह मुहूर्तों में लग्न का उचित चुनाव भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि तुला और वृश्चिक दिन में मकर और धनु राशि में बधिर संज्ञक, मेष-वृष राशि दिन में तथा कन्या-मिथुन और कर्क राशि में अंध संज्ञक होती हैं। कुंभ राशि दिन में और मीन राशि रात्रि में पंगु संज्ञक होती हैं। बधिर संज्ञक राशि में विवाह करने से दरिद्रता, दिन में अगर अंध संज्ञक लग्न हो तो वैधव्य, अगर यह लग्न रात्रि में हो तो संतान की मृत्यु आदि का योग बनता है।

विवाह जीवन भर सुख-शांति को बनाये रखने के लिए किया जाता है, अतएव विवाह का दिन निर्धारण करने से पूर्व शुभ मुहूर्त का चयन करना अनिवार्य है। योग्य पंडित से विवाह की तिथि का निर्धारण कराया जाना चाहिए।

पंडित जी वर-वधू के शुभ-अशुभ ग्रहों का मिलान करके ही विवाह का मुहुर्त निकालते हैं। शुभ मुहुर्त में लिए गए सात फेरे व्यक्ति का दुर्घटनाओं से बचाव करते हैं। विवाह के समय का निर्णय करने के लिए कुंडली में विवाह संबंधित भाव व भावेश की स्थिति, विवाह का योग देने वाले ग्रहों की दशा, अंतर्दशा तथा वर्तमान ग्रहों के गोचर की स्थित देखी जाती है।

विवाह के सही समय के निर्धारण के लिए पंचाग के 5 तत्व तिथि, नक्षत्र, वार, योग व करण मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य व चंद्र पर आधारित महीने, लग्न व राशि के भिन्न-भिन्न योग या युति के साथ मिलाकर विवाह के शुभ मुहुर्त का चयन किया जाता है। मुहुर्त का एक महत्वपूर्ण भाग लग्न है, जिस पर साधारणतया अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। मुहुर्त में बहुत शुभ या अनुकूल बातें ना भी हों, किन्तु यदि लग्न का समय ध्यान से निकाला गया हो, तो वह मुहुर्त के दूसरे अंगों द्वारा आई बाधाओं व दोषों को दूर कर देता है। जब बृहस्पति और शुक्र अस्त हो, तो वह समय विवाह के लिए वर्जित है। महीने में आषाढ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक का समय विवाह के लिए ठीक नहीं है। इस समय से बचना चाहिए। सात फेरों के समय शुभ मुहूर्त का विचार करना आवश्यक हैं।

बृहस्पति के कर्क, सिंह के नवमांश में, स्वयं के नवमांश में तथा मंगल के नवमांश अर्थात् उच्च मित्र क्षेत्री तथा स्वक्षेत्री होने पर विवाह किया जा सकता है। अधिक मास, गुरु और शुक्र के अस्तकाल तथा समय शुद्धि का ध्यान रखते हुए विवाह किया जा सकता है। ऊपर वर्णित दोषों के बावजूद हमारे देश में अधिकांश विवाह अबूझ मुहूर्तों में सम्पन्न होते आ रहे हैं।

विशेष मत तो यह है कि वर और कन्या की कुंडली का समग्र रूप से मिलान किया जाए, जिसमें मंगल दोष, संतान, आयु, आपसी तालमेल, वैधव्य स्थिति, स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति, शिक्षा के स्तर इत्यादि पर विशेष विचार करने के उपरांत शुभ नक्षत्र और समय में विवाह किया जाना चाहिए।

शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मचर्य आश्रम के बाद गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए ‘विवाह संस्कार’ का होना अत्यावश्यक होता है। यह संस्कार मनुष्य के पूरे जीवन को प्रभावित करने वाला होता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर-कन्या के चुनाव हेतु उनकी कुंडलियों का समग्रता के साथ अध्ययन किया जाता है। उनके लग्न, नक्षत्र और अष्टकुट मिलान के द्वारा यह तय किया जाता है कि अमुक कन्या अमुक वर के योग्य है, या नहीं? उनके बीच सुखद दांपत्य स्थापित होगा या नहीं? अब प्रश्न उठता है कि तय होने के बाद विवाह किस मुहूर्त में करना चाहिए? क्योंकि मुहूर्त का बहुत बडा प्रभाव भी वर-कन्या के भावी जीवन पर पडता है।

मुहू्र्त शास्त्र के अनुसार शुभ समय पर किये गये कार्यों का प्रतिफल शुभ होता है, इसलिए विवाह जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए शुभ मुहूर्त का चयन अनिवार्य हो जाता है। सामान्यत: मुहूर्त चयन के लिए तिथि, वार, नक्षत्र, करण और योग का अध्ययन किया जाता है परंतु विवाह मुहूर्त के लिए तिथि, वार और नक्षत्रों पर बल दिया जाता है।

इसमें भी नक्षत्र पर विशेष बल दिया जाता है। तिथि, वार पर इसलिए भी अधिक जोर नहीं दिया गया है क्योंकि अशुभ तिथियां किसी खास स्थितियों में काफी शुभ हो जाती है। उदाहरण के लिए चतुर्थी तिथि अगर शनिवार को हो तो सिद्घ योग बन जाता है। यद्यपि पृथक रूप से दोनों ही अशुभ तिथि तथा दिन होते हैं लेकिन नक्षत्रों के साथ ऐसी कोई बात नहीं होती।

विवाह के लिए रोहिणी, मृगाशिरा, मघा, अनुराधा, तीनों उत्तरा, स्वाति, हस्त, मूल एवं रेवती नक्षत्र माने जाते हैं। रोहिणी नक्षत्र में विवाह सम्पन्न होने पर दंपति में आपसी प्रेम बढता है और संतान-पक्ष सुदृढ होता है। मृगाशिरा नक्षत्र संतान की प्रगति का कारक होता है और सुखमय लम्बा दांपत्य देता है।

मघा-नक्षत्र सुखी संतान का कारक और हस्त नक्षत्र मान-सम्मान प्राप्त कराने वाला होता है। अनुराधा नक्षत्र पुत्र-पुत्रियां प्रदान कराने वाला होता है। उत्तरा नक्षत्र विवाह के दो-तीन वर्षों के अंदर ही उन्नति देने वाला होता है। स्वाति नक्षत्र विवाह के तुरंत बाद उन्नति कराता है। रेवती नक्षत्र धन-संपत्ति और समृद्घि विवाह के चार साल बाद देता है।

मूल, मघा और रेवती नक्षत्र का चयन करते समय उनके चरणों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मूल और मघा के प्रथम और रेवती के चतुर्थ चरण का परित्याग करना चाहिए।

किन गुण दोषों का ध्यान रखें, विवाह मुहूर्त निर्धारण में :-

विवाह संस्कार मानव जीवन का एक प्रमुख और सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यह संस्कार शास्त्रों के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का पालन करते हुए विधि विधानपूर्वक करना चाहिए।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर और कन्या की जन्म कुंडलियां मिलाकर किए जाने वाले विवाह के मुहूर्त में प्रमुख दोषों का विवेचन प्रस्तुत है।

सामान्य रूप से सभी शुभ कार्यों में वर्जित 21 प्रमुख दोष —

पंचांग शुद्धि अभाव, सूर्योदयास्त या गुरु, शुक्रास्त विभिन्न देश के रीति रिवाज को छोड़कर, संक्रांति दिन, पाप षडवर्ग में लग्न होना, विवाह लग्न में छठे शुक्र व अष्टम में मंगल, त्रिविध गणांत, लग्न कारी योग, विकंगत चंद्रमा, वर-वधू की राशि से अष्टम लग्न, विषघटी, दुर्मुहूर्त पाप ग्रह वार दोष, लतादि दोष, ग्रहण नक्षत्र, उल्पात नक्षत्र, पाप विद्ध नक्षत्र, पापयुत नक्षत्र, पाप नवांश व क्रांतिसाम्य (महापाप)।

विवाह मास सूर्य संक्रमण की मेष, वृष, मिथुन, वृश्चिक, मकर, कुंभ राशियों के चांद्र मासों में विवाह उत्तमोत्तम होता है।श्रावण, भाद्रपद एवं आश्विन मास विवाह के लिए उत्तम हैं।

विवाह तिथियां द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी एवं त्रयोदशी तिथियां विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। प्रतिपदा (कृष्ण), षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी एवं पूर्णिमा तिथियां विवाह के लिए उत्तम हैं।

विवाह वार सोमवार, बुधवार, गुरुवार एवं शुक्रवार विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। रविवार विवाह के लिए उत्तम हैं। विवाह नक्षत्र रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तरभाद्र एवं रेवती नक्षत्र विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। अश्विनी, चित्रा, श्रवण एवं धनिष्ठा नक्षत्र विवाह के लिए उत्तम हैं।

विवाह योग प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, सुकर्मा, धृति, वृद्धि, धु्रव, सिद्धि, वरीयान, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल एवं ब्रह्म योग विवाह के लिए प्रशस्त हैं। विवाह करण बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर और वणिज विवाह के लिए प्रशस्त हैं। शकुनि, चतुष्पद, नाग एवं किंस्तुघ्न करण विवाह के लिए सामान्य हैं। विष्टि करण विवाह के लिए सर्वथा त्याज्य है।

गुरु/शुक्र अस्त विचार गुरु और शुक्र ग्रह यदि अस्त चल रहे हों, तो उसे तारा डूबा कहते हैं। इसलिए गुरु-शुक्र का अस्त काल विवाह मुहूर्त के लिए त्याज्य है। देव शयन विचार जब सूर्य उत्तरायण होता है, उस काल को देवताओं का दिन माना जाता है।

सूर्य दक्षिणायन काल देवताओं की रात्रि मानी जाती है। यही काल देवताओं का शयन काल कहलाता है।

देव शयन काल में भी विवाह मुहूर्त त्याज्य होता है। विवाह में विशेष लत्तादि दोष विवाह लग्न में मुख्य रूप से 10 दोष वर्जित हैं, जो इस प्रकार हैं :-

“लत्ता पात युति वेध जामित्र बाणपंचक एकार्गल उपग्रह क्रांतिसाम्य दग्धा।”

इनमें वेध व क्रांतिसाम्य अति गंभीर दोष हैं, अतः विवाह लग्न में इनका त्याग अवश्य करना चाहिए।

1. लत्ता दोष :— लत्ता दोष एक गंभीर दोष है जिसका सर्वथा त्याग करना चाहिए। इसकी दो स्थितियां होती हैं।

2. पात दोष :– सूर्य जिस नक्षत्र में हो उसी नक्षत्र में यदि फेरों का समय आ जाए तो पात दोष होता है। मघा, आश्लेषा, चित्रा, अनुराधा, रेवती और श्रवण ये 6 पातकी नक्षत्र हैं। ये सभी सूर्य के संयोग से पतित हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त साध्य, हर्षण, शूल, वैधृत, व्यतिपात व गंड इन योगों का अंत यदि उस दिन के नक्षत्र में हो, तो पात दोष होता है। इसे चंडायुध दोष भी कहते हैं। यह प्रायः सभी शुभ कार्यों में वर्जित है।

3. युति दोष :— विवाह नक्षत्र में पाप ग्रह का विचरण या युति हो, तो युति दोष होता है। सूर्य, मंगल, शनि, राहु और केतु पाप ग्रह हैं। यदि चंद्र षडवर्ग में श्रेष्ठ, उच्च, स्वक्षेत्री या मित्र हो, तो युति दोष का परिहार हो जाता है। शुभ ग्रहों में बुध और गुरु यदि चंद्र के नक्षत्र में हों और मित्र राशि में हों, तो भी युति दोष नहीं माना जाता। शुक्र की युति को शुभ माना गया है, इसका दोष नहीं लगता है।

युति दोष के शुभ-अशुभ फल इस प्रकार हैं :-

4. वेध दोष :— विवाह नक्षत्र का जिस नक्षत्र में वेध हो, उसमें कोई क्रूर या पाप ग्रह चल रहा हो, तो वेध दोष ओर के 12 वें नक्षत्र को सूर्य, तीसरे को मंगल, छठे को बृहस्पति और आठवें को शनि लात मारता है।

दूसरी स्थिति में बायीं ओर के सातवें नक्षत्र को बुध, नौवें को राहु, पांचवें को शुक्र और 22 वें को पूर्ण चंद्र लात मारता है। इसका फल इस प्रकार है। पंचशलाका चक्र में एक रेखा पर पड़ने वाले निम्न नक्षत्रों में ग्रह होने से नक्षत्रों का परस्पर वेध हो जाता है। रोहिणी-अभिजित, भरणी-अनुराधा, उत्तराषाढ़ा-मृगशिरा, श्रवण-मघा, हस्त – उत्तराभाद्रपद, स्वाति-शतभिषा मूल-पुनर्वसु, रेवती – उत्तराफलगुनि , चित्रा-पूर्वाभाद्रपद, ज्येष्ठा-पुष्य, पूर्वाषाढ़-आद्र्रा, धनिष्ठा-अश्लेषा, अश्विनी-पूर्वाफाल्गुनी, विशाखा-कृत्तिका का आपस में वेध होता है।।

यदि विवाह नक्षत्र में शुभ ग्रह का वेध हो तो ‘पादवेध’ होता है। पादवेध में पूरा नक्षत्र दूषित नहीं होता, सिर्फ चरण दूषित होता है। यदि नक्षत्र के चतुर्थ चरण पर ग्रह हो, तो सामने वाले नक्षत्र के प्रथम चरण पर वेध होगा। यदि ग्रह द्वितीय चरण पर हो, तो सामने वाले नक्षत्र के तृतीय चरण पर वेध होगा।

विवाह मुहूर्त में पादवेध के काल का ही त्याग करना चाहिए, संपूर्ण नक्षत्र का नहीं। पापग्रहों द्वारा भोगकर छोड़े हुए नक्षत्र को यदि चंद्र भोग ले, तो नक्षत्र शुद्ध होकर वेध दोष दूर हो जाता है।

‘रवि वेधे च वैधकं, पुत्रशोको भवेत कुजे।’अर्थात सूर्य के वेध में विवाह करने से कन्या विधवा हो जाती है और मंगल वेध से पुत्रशोक होता है। शनि के वेध से मृतसंतान उत्पन्न होती है तथा राहु के वेध से स्त्री व्यभिचारिणी हो जाती है। अतः लग्न में इसका परित्याग अवश्य ही करना चाहिए।

5. यामित्र दोष :— विवाह नक्षत्र से 14 वें नक्षत्र पर कोई ग्रह हो, तो यामित्र या जामित्र दोष लगता है। जामित्र अर्थात सप्तम स्थान। विवाह के समय चंद्र या लग्न से सप्तम भाव में कोई ग्रह हो, तो यह दोष होता है। अतः सप्तम स्थान की शुद्धि आवश्यक होती है। पूर्ण चंद्र, बुध, गुरु और शुक्र के होने से जामित्र शुभ तथा पाप ग्रहों के होने से अशुभ फलदायक होता है। सप्तम अशुभ ग्रह व्याधि और वैधव्य का कारक होता है।

6. बाण पंचक दोष :— संक्रांति के व्यतीत दिनों (लगभग 16 दिन) में 4 जोड़कर 9 का भाग देने पर शेष 5 रहे तो मृत्यु पंचक दोष होता है। यदि गतांश में 6 जोड़कर 9 का भाग देने 5 शेष बचे, तो रोग पंचक, 3 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो अग्नि पंचक, यदि 1 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो राज पंचक और यदि 8 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो चोर पंचक दोष होता है। यदि शेष 5 नहीं रहे, तो बाण दोष नहीं होगा। यदि रविवार को रोग पंचक लगे तो सोमवार को राज पंचक, मंगल को अग्नि पंचक, शुक्र को चोर पंचक और शनि को मृत्यु पंचक होता है। ये सभी दोष विवाह में वर्जित हैं। रोग और चोर पंचक रात्रि में, राज और अग्नि पंचक दिन में और दोनों की संधि में मृत्यु पंचक वर्जित है। मृत्यु पंचक को छोड़ कर 4 पंचकों में दोष का निर्वाह हो जाता है। लेकिन मृत्यु पंचक सर्वथा वर्जित है। इसमें विवाह नहीं करना चाहिए।

07. एकार्गल दोष :– विष्कुम्भ, अतिगंड, शूल, गंड, व्याघात, वज्र, व्यतिपात, परिघ, वैधृति ये अशुभ योग विवाह के दिन हों तथा सूर्य नक्षत्र से विवाह नक्षत्र विषम हो तो एकार्गल दोष होता है। इसमें नक्षत्र गणना 28 मानकर की जाती है। इस दोष में खोड़ी (ऽ) लगती है दोष नहीं हो तो रेखा (।) लगाते हैं।

8. उपग्रह दोष : — सूर्य नक्षत्र से विवाह नक्षत्र तक गणना में 5, 7, 8, 10, 14, 15, 18, 19, 21, 22, 23, 24 या 25वें नक्षत्र में कोई ग्रह आए, तो उपग्रह दोष होता है।

9. क्रांतिसाम्य दोष : — जब स्पष्ट चंद्रक्रांति सूर्य क्रांति के बिल्कुल समान हो तब क्रांतिसाम्य दोष होता है। एक ही अयन में स्पष्ट चंद्र व सूर्य का योग 360 अंश पर क्रांतिसाम्य होने पर वैधृति नामक महापात होता है। विभिन्न अयन में स्पष्ट चंद्र व सूर्य का योग 180 अंश पर क्रांतिसाम्य होने पर यह व्यतिपात संज्ञक होता है। क्रांतिसाम्य काल का निर्धारण गणित विधि से सिद्धांतोक्त पाताध्यायों के अनुसार किया जाता है।

साधारण तौर पर मेष-सिंह, वृष-मकर, तुला-कुंभ, कन्या-मीन, कर्क-वृश्चिक और धनु-मिथुन इन राशि युग्मों में, एक में सूर्य व एक में चंद्र हो, तो क्रांतिसाम्य दोष संभावित होता है। क्रांतिसाम्य दोष शुभ कार्यों में सभी शुभ गुणों को नष्ट कर देता है। विवाह पटल के अनुसार शस्त्र से कटा, अग्नि में जला या सर्प के विषदंश से पीड़ित व्यक्ति तो जीवित बच सकता है, किंतु क्रांतिसाम्य में विवाह करने पर वर-वधू दोनों ही जीवित नहीं रहते। अतः लग्न शुभ (शुद्ध) होने पर भी उक्त दोषों (क्रांतिसाम्य, वेधदोष) में विवाह नहीं करना चाहिए। सूक्ष्म क्रांति साम्य (महापात) की गणित गणना होती है। इसमें सभी शुभ कार्य वजिर्त हैं।।

10.दग्धा तिथि :— सूर्य राशि से तिथि को वर्जित माना गया है।

नीचे दिए गए तिथि चक्र में जिस माह के सूर्य के नीचे जो तिथि लिखी गई है, वह दग्धा तिथि मानी जाती है। इसमें विवाहादि शुभ कार्य वर्जित हैं। विशेष रूप से त्याज्य चार दोष विवाह लग्न में निम्नोक्त 4 दोष भी त्याज्य हैं :-

मर्म वेध :-
 लग्न में पाप ग्रह होने से मर्म वेध होता है।

कंटक दोष :-
 त्रिकोण में पाप ग्रह होने से कंटक दोष होता है।

शल्य दोष :-
 चतुर्थ और दशम में पाप ग्रह होने से शल्य दोष होता है।

छिद्र दोष :-
सप्तम भाव में पाप ग्रह होने से छिद्र दोष होता है। ज्येष्ठा विचार ज्येष्ठ मास में उत्पन्न व्यक्ति का ज्येष्ठा नक्षत्र हो तो ज्येष्ठ मास में विवाह वर्जित होता है। वर और कन्या दोनों का जन्म ज्येष्ठ मास में हुआ हो, तो इस स्थिति में भी ज्येष्ठ मास में विवाह वर्जित है। विवाह के समय तीन ज्येष्ठों का एक साथ होना वर्जित है। दो या चार या छह ज्येष्ठा होने से विवाह हो सकता है।

सिंह-गुरु वर्जित :-
सिंह राशि में गुरु हो तो विवाह वर्जित होता है। लेकिन मेष का सूर्य रहे तो सिंह के गुरु में विवाह हो सकता है।

होलाष्टक :-
फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष में होलिका दहन से 8 दिन पहले अर्थात् शुक्लाष्टमी से पूर्णिमा तक होलाष्टक रहते हैं जो कि शतरुद्रा, विपाशा, इरावती और तीनों पुष्कर को छोड़कर सर्वत्र शुभ हैं, इसलिए इन स्थानों के अतिरिक्त सर्वत्र विवाहादि शुभ कार्य हो सकते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य प्रमुख दोषों का फल इस प्रकार है। व्यतिपात में विवाह होने पर मृत्यु और वंश नाश की संभावना रहती है।

गंडांत में विवाह होने पर मृत्यु, वज्र में विवाह होने पर अग्निदाह, गंड में रोग होता हैं।।

विवाह में लग्न शुद्धि दिन और रात के 24 घंटों में 12 राशियों के 12 लग्न होते हैं। सभी मुहूर्तों में लग्न की सर्वाधिक प्रधानता होती है। विवाह आदि शुभ कार्यों में लग्न का शोधन गंभीरता से किया जाता है। विवाह हेतु वृष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु लग्न शुभ कहे गए हैं, इन लग्नों में विवाह उत्तम फलदायी होता है। अलग-अलग भावों में स्थित ग्रह विवाह लग्न हेतु अशुभ होते हैं।

इस संदर्भ में एक संक्षिप्त विवरण नीचे की सारणी में दी गई है। इनमें से कुछ ग्रहों की पूजा कराकर लग्न शुद्धि की जा सकती है। इनकी शांति के उपरांत विवाह में तथा दाम्पत्य जीवन में बाधाएं नहीं आतीं।

विवाह लग्न में शुभ ग्रह केंद्र, त्रिकोण या द्वितीय, द्वादश में हों और पाप ग्रह भाव 3, 6 या 11 में स्थित हों तो शुभफल देते हैं। लग्न (प्रथम भाव) से षष्ठ में शुक्र व अष्टम में मंगल अशुभ होता है। सप्तम भाव ग्रह रहित हो, विवाह लग्न से चंद्र भाव 6, 8 या 12 में न हो, तो लग्न शुभ होता है।

लग्न भंग :-
 मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के लग्न के व्यय भाव में शनि हो, तो उस लग्न में विवाह नहीं करना चाहिए। दशम में मंगल, तृतीय में शुक्र, लग्न में चंद्र या पाप ग्रह हो, लग्नेश, सूर्य, चंद्र छठे भाव में हो अथवा चंद्र, लग्न का स्वामी या कोई शुभ ग्रह आठवें भाव में हो अथवा सप्तम भाव में कोई भी ग्रह हो, तो लग्न भंग होता है।

विवाह लग्न में कन्या, मिथुन, धनु का पूर्वाधि नवांश शुभ होता है, बशर्ते ये अंतिम नवांश में न हो। उक्त राशियों का नवांश हो, तो दम्पति को पुत्र, धन व सौभाग्य की प्रप्ति होती है। वर और कन्या की जन्म राशियों या लग्नों से अष्टम या द्वादश भाव का नवांश यदि अनेक गुणों से युक्त हो तो त्याज्य है।

श्री रामदैवज्ञ के अनुसार, लग्न का स्वामी लग्न में स्थित हो या उसे देखता हो, अथवा नवांश का स्वामी नवांश में स्थित हो या उसे देखता हो, तो वह वर को शुभफल प्रदान करता है। इसी प्रकार नवांश का सप्तमेश सप्तम भाव को देखता हो, तो वधू के लिए शुभ फलदायक होता है।

कर्तरी दोष एवं परिहार :-
 विवाह लग्न से दूसरे या 12वें भाव में यदि पाप ग्रह हो, तो कर्तरी दोष होता है, जो कैंची की तरह दोनों ओर से लग्न की शुभता को काटता है। लग्न से द्वितीय स्थान में पापग्रह वक्री और द्वादश में पाप ग्रह मार्गी हो, तो यह दोष महाकर्तरी होता है, इसका सर्वथा त्याग करना चाहिए। लग्न में बलवान शुभग्रह हो, तो कर्तरी दोष भंग हो जाता है। केंद्र या त्रिकोण में गुरु, शुक्र या बुध हो, या कर्तरीकारक ग्रह नीचस्थ अथवा शत्रुक्षेत्री हो, तो कर्तरी दोष होता है।

पंगु, अंध, बधिर लग्न :-
तुला और वृश्चिक दिन में तथा धनु एवं मकर रात्रि में बधिर (बहरी) होते हैं। बधिर लग्न में विवाह करने से जीवन दुखमय होता है। मेष, वृष और सिंह दिन में तथा मिथुन, कर्क और कन्या रात्रि में अंधे होते हैं। दिन में कुंभ एवं रात्रि में मीन लग्न पंगु (विकलांग) होता है। पंगु लग्न में विवाह होने पर धन का नाश होता है। दिवा अंध लग्न में कन्या विधवा हो जाती है, जबकि रात्रि अंध लग्न संतान के लिए मृत्युकारक होता है। इसलिए इन दोषपूर्ण लग्नों से बचना चाहिए। किंतु, यदि लग्न का स्वामी या गुरु लग्न को देखता हो, तो पंगु, बधिर आदि लग्न दोष नहीं होते हैं। त्रिबल शुद्धि विचार वर व कन्या की जन्मराशि से सूर्य, चंद्र व गुरु का गोचर नाम त्रिबल विचार है। विवाह मुहूर्त के दिनों में से जिस दिन त्रिबल शुद्धि बन जाए, उसी दिन विवाह निश्चय करके बता देना चाहिए।

कन्या के लिए गुरुबल व वर के लिए सूर्यबल का विचार और चंद्रबल का विचार दोनों के लिए करना चाहिए। सूर्य, चंद्र और गुरु की शुिद्ध होने पर ही विवाह शुभ होता है।

वरस्य भास्कर बलं :-
विवाह के समय वर के लिए सूर्य का बलवान और शुभ होना अति आवश्यक है। सूर्य के बलवान होने से दाम्पत्य जीवन में पति का पत्नी पर प्रभाव व नियंत्रण रहता है। दोनों में वैचारिक सामंजस्य रहता है एवं जीवन के कठिन समय में संघर्ष करने की क्षमता भी सूर्य से प्राप्त होती है। सूर्य की शुभतासे संपूर्ण वैवाहिक जीवन सुखमय होता है।

विवाह के समय वर की जन्म राशि से तीसरे, छठे, 10वें और 11वें भाव में सूर्य का गोचर श्रेष्ठ किंतु चैथे, आठवें और 12वें भाव में अनिष्ट होने के कारण त्याज्य है। पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें और नौवें भाव का सूर्य पूजनीय है अर्थात विवाह से पहले सूर्य की पूजा व लाल दान करने से ही विवाह शुभ हो पाता है। इनमें पहले और सातवें स्थान का सूर्य वर द्वारा विशेष पूज्य माना गया है।

दाम्पत्य जीवन में वर के वर्चस्व के लिए यह आवश्यक है कि सूर्य के उत्तरायण काल, शुक्ल पक्ष व दिवा लग्न में ही विवाह करे। दिवा लग्न में भी अभिजित मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ है। सूर्य जिस राशि में हो उससे चतुर्थ राशि का लग्न अभिजित लग्न कहलाता है। यह स्थानीय मध्याह्न काल (दोपहर) में पड़ता है। स्थानीय समयानुसार दिन के 12 बजने से 24 मिनट पूर्व 24 मिनट पश्चात तक 48 मिनट का अभिजित मुहूर्त होता है। उत्तम जाति ब्राह्मण व क्षत्रियों के लिए यह विवाह लग्न श्रेष्ठ कही गया है।

दक्षिण भारतीय ब्राह्मण अभिजित लग्न में ही विवाह करते हैं और यही कारण है कि उत्तर भारतीयों की अपेक्षा उनका वैवाहिक जीवन अधिक सफल रहता है। जन्मगत जाति के आधार पर ही नहीं बल्कि जन्म नक्षत्र के अनुसार यदि वर का वर्ण ब्राह्मण या क्षत्रिय हो, तो भी अभिजित लग्न में ही विवाह शुभफलदायी होता है।

विवाह लग्न में सूर्य यदि एकादश भाव में हो, तो यह सोने में सुहागा होता है। विवाह हेतु अन्य लग्न शुद्धि न हो सके, तो अभिजित मुहूर्त या लग्न में विवाह सभी वर्गों के लिए शुभ होता है।

कन्यायां गुरौ बलं :-
कन्या के दाम्पत्य सुख व पति भाव का कारक गुरु है, इसलिए गुरु की शुद्धि में कन्या का विवाह शुभ होता है। कन्या की जन्म राशि से दूसरे, पांचवें, सातवें, नौवें या 11वें में स्थित गुरु विवाह हेतु शुभ माना जाता है, क्योंकि इन स्थानों में गुरु बलवान होता है। पहले, तीसरे, छठे या 10वें में स्थित गुरु मध्यम होता है, जो पूजा से शुभ हो जाता है।

कन्या से पीला दान करा कर विवाह करना चाहिए। चैथे, आठवें या 12वें में स्थित गुरु अशुभ होता हैं, यह पूजा से भी शुभ नहीं होता। अतः कन्या की जन्म राशि से चैथे, आठवें या 12वें में स्थित गुरु विवाह हेतु वर्जित है।

इन स्थानों में गुरु का गोचर वैधव्यप्रद होता है। मिथुन या कन्या राशि में हो, तो कन्या की हानि होती है। कर्क या मकर राशि में हो, तो कन्या के लिए दुखदायी होता है। किंतु उक्त स्थानों में स्वराशि या परमोच्च हो, तो शुभ होता है।

सिंह राशि के नवांश में गुरु हो, तो विवाह नहीं करना चाहिए। कन्या के विवाह हेतु गुरु शुद्धि का इतना गहन विचार तो उस समय किया जाता था जब उसका विवाह दस वर्ष या इससे भी कम की आयु में होता था।

आजकल तो लड़की का विवाह सोलह वर्ष के बाद ही होता है। इस उम्र तक वह कन्या नहीं रहती, वह तो रजस्वला होकर युवती हो जाती है। इसलिए गुरुबल शुद्धि रहने पर भी पूजा देकर लड़की का विवाह कराना शास्त्रसम्मत है। ऐसे में विवाह लग्न शुद्धि के लिए चंद्रबल देखना ही अनिवार्य है।

विवाहे चंद्रबलं :–
 श्री बादरायण के अनुसार गुरु और शुक्र के बाल्य दोष में कन्या का और वृद्धत्व दोष में पुरुष का विनाश होता है। गुरु अस्त हो तो पति का, शुक्रास्त हो, तो कन्या का तथा चंद्रास्त हो, तो दोनों का अनिष्ट होता है। अतः विवाह के समय वर और कन्या दोनों के लिए चंद्रबल शुद्धि आवश्यक है। चंद्र का गोचर दोनों की जन्म राशियों से तीसरे, छठे, सातवें, 10वें या 11वें भाव में शुभ (उत्तम) होता है। पहले, दूसरे, पांचवें, नौवें या 12वें में चंद्रमा पूज्य है। चैथे, आठवें या 12वें स्थान का चंद्र दोनों के लिए अशुभ होता है। विवाह पटल के अनुसार चैथा और 12वां चंद्र ही अशुभ होने के कारण त्याज्य है।

एकार्गलादि विवाह संबंधी दोष चंद्र एवं सूर्य के बलयुक्त होने के कारण नष्ट हो जाते हैं, अर्थात् दोनों उच्चस्थ या मित्र क्षेत्री होकर विवाह लग्न में बैठे हो, तो समस्त दोष दूर हो जाते हैं। चंद्र बुध के साथ शुभ और गुरु के साथ सुखदायक होता है। विवाह लग्न में चंद्र की निम्नलिखित युतिस्थितियां दोषपूर्ण होती हैं, इनका त्याग करना चाहिए।

सूर्य-चंद्र की युति – यह युति दंपति को दारिद्र्य दुख देती है।

चंद्र-मंगल की युति – इस युति के फलस्वरूप मरणांतक पीड़ा होती है।

चंद्र-शुक्र की युति – इस युति के फलस्वरूप पति पराई स्त्री से प्रेम करता है, अर्थात् पत्नी को सौतन का दुख झेलना पड़ता है।

चंद्र-शनि की युति – यह युति वैराग्य देती है चंद्र-राहु की युति – राहु से युत चंद्र कलहकारी होता है।

चंद्र-केतु की युति – यह युति कष्ट प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त यदि विवाह लग्न में चंद्र दो पाप ग्रहों से युत हो तो मृत्यु का कारक  होता है। विवाह में गोधूलि विचार भी किया जाना चाहिए क्योंकि इसमें सभी दोष त्याज्य हैं।

ऎसी मान्यता है कि शनि जो काल का प्रतीक है, समय का निर्णय करता है और बृहस्पति विवाह के लिए आशीर्वाद देता है। इस प्रकार मंगल जो पौरूष, साहस व पराक्रम का प्रतीक है, उसका भी विवाह संबंधित भाव व ग्रहों के ऊपर से विवाह की तिथि की 6 मास की अवधि के गोचर में विचरण होना चाहिए अथवा गोचर से दृष्टि होनी चाहिए। विवाह का समय निश्चित करने के लिए अष्टकवर्ग विधि का प्रयोग किया जाता है।

व्यक्तिगत, सामाजिक तथा राजनैतिक सभी प्रकार के कार्यो को शुभ मुहुर्त में आरंभ करने से सिद्धि व सफलता प्राप्त होती है। अंग्रेजी शासकों से स्वतंत्रता प्राप्ति के 24 घंटे बाद इस महत्वपूर्ण घोषणा के लिए हमारे महान नेताओं ने शुभ मुहुर्त का बेताबी से इंतजार किया था। यही वजह है कि हमारा देश आज संसार का सबसे बडा गणतंत्र और समृद्धशाली देशों की पंक्ति में गिना जाता है।

 क्यों किया जाता है कुंडली मिलान?

विवाह स्त्री व पुरुष की जीवन यात्रा की शुरुआत मानी जाती है। पुरुष का बाया व स्त्री का दाहिना भाग मिलाकर एक-दूसरे की शक्ति को पूरक बनाने की क्रिया को विवाह कहा जाता है। भगवान शिव और पार्वती को अर्द्धनारीश्वर की संज्ञा देना इसी बात का प्रमाण है। ज्योतिष में चार पुरुषार्थो में काम नाम का पुरुषार्थ विवाह के बाद ही पूर्ण होता है।

 आइये जाने शुभ मूहूर्त के अनुसार विवाह में वर्जित काल -
वैवाहिक जीवन की शुभता को बनाये रखने के लिये यह कार्य शुभ समय में करना उत्तम रहता है अन्यथा इस परिणय सूत्र की शुभता में कमी होने की संभावनाएं बनती है।कुछ समय काल विवाह के लिये विशेष रुप से शुभ समझे जाते है।इस कार्य के लिये अशुभ या वर्जित समझे जाने वाला भी समय होता है जिस समय में यह कार्य करना सही नहीं रहता है।

आईये देखे की विवाह के वर्जित काल कौन से है :-

1. नक्षत्र व सूर्य का गोचर-
27 नक्षत्रों में से 10 नक्षत्रों को विवाह कार्य के लिये नहीं लिया जाता है  इसमें आर्दा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुणी, उतराफाल्गुणी, हस्त, चित्रा, स्वाती आदि नक्षत्र आते है।इन दस नक्षत्रों में से कोई नक्षत्र हो व सूर्य़ सिंह राशि में गुरु के नवांश में गोचर कर तो विवाह करना सही नहीं रहता है।

2. जन्म मास, जन्मतिथि व जन्म नक्षत्र में विवाह -
इन तीनों समयावधियों में अपनी बडी सन्तान का विवाह करना सही नहीं रहता है व जन्म नक्षत्र व जन्म नक्षत्र से दसवां नक्षत्र, 16वां नक्षत्र, 23 वां नक्षत्र का त्याग करना चाहिए।

3. शुक्र व गुरु का बाल्यवृ्द्धत्व-
शुक्र पूर्व दिशा में उदित होने के बाद तीन दिन तक बाल्यकाल में रहता है।इस अवधि में शुक्र अपने पूर्ण रुप से फल देने में असमर्थ नहीं होता है। इसी प्रकार जब वह पश्चिम दिशा में होता है 10 दिन तक बाल्यकाल की अवस्था में होता है। शुक्र जब पूर्व दिशा में अस्त होता है तो अस्त होने से पहले 15 दिन तक फल देने में असमर्थ होता है व पश्चिम में अस्त होने से 5 दिन पूर्व तक वृ्द्धावस्था में होता है।इन सभी समयों में शुक्र की शुभता प्राप्त नहीं हो पाती है।गुरु किसी भी दिशा मे उदित या अस्त हों, दोनों ही परिस्थितियों में 15-15 दिनों के लिये बाल्यकाल में वृ्द्धावस्था में होते है।

उपरोक्त दोनों ही योगों में विवाह कार्य संपन्न करने का कार्य नहीं किया जाता है,शुक्र व गुरु दोनों शुभ है इसके कारण वैवाहिक कार्य के लिये इनका विचार किया जाता है।

4. चन्द्र का शुभ/ अशुभ होना-
चन्द्र को अमावस्या से तीन दिन पहले व तीन दिन बाद तक बाल्य काल में होने के कारण इस समय को विवाह कार्य के लिये छोड दिया जाता है।ज्योतिष शास्त्र में यह मान्यता है की शुक्र, गुरु व चन्द्र इन में से कोई भी ग्रह बाल्यकाल में हो तो वह अपने पूर्ण फल देने की स्थिति में न होने के कारण शुभ नहीं होता है और इस अवधि में विवाह कार्य करने पर इस कार्य की शुभता में कमी होती है।

5. तीन ज्येष्ठा विचार-
विवाह कार्य के लिये वर्जित समझा जाने वाला एक अन्य योग है जिसे त्रिज्येष्ठा के नाम से जाना जाता है। इस योग के अनुसार सबसे बडी संतान का विवाह ज्येष्ठा मास में नहीं करना चाहिए। इस मास में उत्पन्न वर या कन्या का विवाह भी ज्येष्ठा मास में करना सही नहीं रहता है।ये तीनों ज्येष्ठ मिले तो त्रिज्येष्ठा नामक योग बनता है।इसके अतिरिक्त तीन ज्येष्ठ बडा लडका, बडी लडकी तथा ज्येष्ठा मास इन सभी का योग शुभ नहीं माना जाता है। एक ज्येष्ठा अर्थात केवल मास या केवल वर या कन्या हो तो यह अशुभ नहीं होता व इसे दोष नहीं समझा जाता है।

6. त्रिबल विचार-
इस विचार में गुरु कन्या की जन्म राशि से 1, 8 व 12 भावों में गोचर कर रहा हो तो इसे शुभ नहीं माना जाता है।

गुरु कन्या की जन्म राशि से 3,6 वें राशियों में हों तो कन्या के लिये इसे हितकारी नहीं समझा जाता है।तथा 4, 10 राशियों में हों तो कन्या को विवाह के बाद दु:ख प्राप्त होने कि संभावनाएं बनती है।गुरु के अतिरिक्त सूर्य व चन्द्र का भी गोचर अवश्य देखा जाता है।इन तीनों ग्रहों का गोचर में शुभ होना त्रिबल शुद्धि के नाम से जाना जाता है।

7. चन्द्र बल-
चन्द्र का गोचर 4, 8 वें भाव के अतिरिक्त अन्य भावों में होने पर चन्द्र को शुभ समझा जाता है. चन्द्र जब पक्षबली, स्वराशि, उच्चगत, मित्रक्षेत्री होने पर उसे शुभ समझा जाता है अर्थात इस स्थिति में चन्द्र बल का विचार नहीं किया जाता है।

8. सगे भाई बहनों का विचार-
एक लडके से दो सगी बहनों का विवाह नहीं किया जाता है. व दो सगे भाईयों का विवाह दो सगी बहनों से नहीं करना चाहिए. इसके अतिरिक्त दो सगे भाईयों का विवाह या बहनों का विवाह एक ही मुहूर्त समय में नहीं करना चाहिए. जुडंवा भाईयों का विवाह जुडवा बहनों से नहीं करना चाहिए. परन्तु सौतेले भाईयों का विवाह एक ही लग्न समय पर किया जा सकता है. विवाह की शुभता में वृ्द्धि करने के लिये मुहूर्त की शुभता का ध्यान रखा जाता है।

9. पुत्री के बाद पुत्र का विवाह-
पुत्री का विवाह करने के 6 सूर्य मासों की अवधि के अन्दर सगे भाई का विवाह किया जाता है. लेकिन पुत्र के बाद पुत्री का विवाह 6 मास की अवधि के मध्य नहीं किया जा सकता है. ऎसा करना अशुभ समझा जाता है. यही नियम उपनयन संस्कार पर भी लागू होता है. पुत्री या पुत्र के विवाह के बाद 6 मास तक उपनयन संस्कार नहीं किया जाता है दो सगे भाईयों या बहनों का विवाह भी 6 मास से पहले नहीं किया जाता है।

10. गण्ड मूलोत्पन्न का विचार-
मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाली कन्या अपने ससुर के लिये कष्टकारी समझी जाती है. आश्लेषा नक्षत्र में जन्म लेने वाली कन्या को अपनी सास के लिये अशुभ माना जाता है. ज्येष्ठा मास की कन्या को जेठ के लिये अच्छा नहीं समझा जाता है. इसके अलावा विशाखा नक्षत्र में जन्म लेने पर कन्या को देवर के लिये अशुभ माना जाता है. इन सभी नक्षत्रों में जन्म लेने वाली कन्या का विवाह करने से पहले इन दोषों का निवारण किया जाता है।
वैवाहिक जीवन में.. बाधाकारक सभी ग्रह, नक्षत्र , या विवाह प्रतिबन्धक दोषों का .... योग्य ज्योतिष-तंत्र के ज्ञानी के मार्गदर्शन में... निदान विधिवत करा लेना चाहिए।
          पं. कृपाराम उपाध्याय

शनिवार, 3 नवंबर 2018

ज्योतिष में प्रेम विवाह

जब किसी लड़का और लड़की के बीच प्रेम होता है तो वे साथ साथ जीवन बीताने की ख्वाहिश रखते हैं और विवाह करना चाहते हैं। कोई प्रेमी अपनी मंजिल पाने में सफल होता है यानी उनकी शादी उसी से होती है जिसे वे चाहते हैं और कुछ इसमे नाकामयाब होते हैं। ज्योतिषशास्त्री इसके लिए ग्रह योग को जिम्मेवार मानते हैं। देखते हैं ग्रह योग कुण्डली में क्या कहते हैं।
ज्योतिषशास्त्र में "शुक्र ग्रह" को प्रेम का कारक माना गया है । कुण्डली में लग्न, पंचम, सप्तम तथा एकादश भावों से शुक्र का सम्बन्ध होने पर व्यक्ति में प्रेमी स्वभाव का होता है। प्रेम होना अलग बात है और प्रेम का विवाह में परिणत होना अलग बात है।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पंचम भाव प्रेम का भाव होता है और सप्तम भाव विवाह का। पंचम भाव का सम्बन्ध जब सप्तम भाव से होता है तब दो प्रेमी वैवाहिक सूत्र में बंधते हैं। नवम भाव से पंचम का शुभ सम्बन्ध होने पर भी दो प्रेमी पति पत्नी बनकर दाम्पत्य जीवन का सुख प्राप्त करते हैं।

ऐसा नहीं है कि केवल इन्हीं स्थितियो मे प्रेम विवाह हो सकता है। अगर आपकी कुण्डली में यह स्थिति नहीं बन रही है तो कोई बात नहीं है हो सकता है कि किसी अन्य स्थिति के होने से आपका प्रेम सफल हो और आप अपने प्रेमी को अपने जीवनसाथी के रूप में प्राप्त करें। पंचम भाव का स्वामी पंचमेश शुक्र अगर सप्तम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह की प्रबल संभावना बनती है । शुक्र अगर अपने घर में मौजूद हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है।

शुक्र अगर लग्न स्थान में स्थित है और चन्द्र कुण्डली में शुक्र पंचम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह संभव होता है। नवमांश कुण्डली जन्म कुण्डली का शरीर माना जाता है अगर कुण्डली में प्रेम विवाह योग नहीं है और नवमांश कुण्डली में सप्तमेश और नवमेश की युति होती है तो प्रेम विवाह की संभावना 100 प्रतिशत बनती है। शुक्र ग्रह लग्न में मौजूद हो और साथ में लग्नेश हो तो प्रेम विवाह निश्चित समझना चाहिए । शनि और केतु पाप ग्रह कहे जाते हैं लेकिन सप्तम भाव में इनकी युति प्रेमियों के लिए शुभ संकेत होता है।राहु अगर लग्न में स्थित है तो नवमांश कुण्डली या जन्म कुण्डली में से किसी में भी सप्तमेश तथा पंचमेश का किसी प्रकार दृष्टि या युति सम्बन्ध होने पर प्रेम विवाह होता है। लग्न भाव में लग्नेश हो साथ में चन्द्रमा की युति हो अथवा सप्तम भाव में सप्तमेश के साथ चन्द्रमा की युति हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है। सप्तम भाव का स्वामी अगर अपने घर में है तब स्वगृही सप्तमेश प्रेम विवाह करवाता है। एकादश भाव पापी ग्रहों के प्रभाव में होता है तब प्रेमियों का मिलन नहीं होता है और पापी ग्रहों के अशुभ प्रभाव से मुक्त है तो व्यक्ति अपने प्रेमी के साथ सात फेरे लेता है। प्रेम विवाह के लिए सप्तमेश व एकादशेश में परिवर्तन योग के साथ मंगल नवम या त्रिकोण में हो या फिर द्वादशेश तथा पंचमेश के मध्य राशि परिवर्तन हो तब भी शुभ और अनुकूल परिणाम मिलता है।

ऐसे सपने दिखे, तो होगा प्रेम विवाह
आजकल अधिकांश युवा प्रेम विवाह करना चाहते हैं और इसके लिए वे कई तरह के प्रयास भी करते हैं। फिर भी वे यह नहीं समझ पाते कि उनका प्रेम विवाह होगा या नहीं। ऐसे में ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नींद में दिखाई देने वाले सपनों से भी प्रेम विवाह होने या ना होने के संकेत प्राप्त होते हैं।

- यदि कोई युवती स्वप्न में किसी सुंदर चिडिय़ा को चहचहाती हुई देखती है, तो उसका प्रेम विवाह तक अवश्य पहुंचता है।

- यदि कोई लड़की स्वयं तो पलंग पर बिस्तर बिछाते हुए देखे तो शीघ्र ही किसी न किसी से उसका प्रेम संबंध बन सकता है या प्रेमी से उसका विवाह हो सकता है।

- यदि कोई सपने में सर्कस में कलाबाजी दिखाए या किसी और को करतब दिखाते देखे तो उस व्यक्ति के प्रेम में कोई तीसरा व्यक्ति दखल दे सकता है।

- यदि कोई व्यक्ति सपने में फिल्म देखे और फिल्म में प्रणय दृश्य देखता है तो उसके प्रेम संबंध में बड़ी परेशानियां उत्पन्न हो जाती है।

- यदि सपने में कोई संगीत सुनता है तो उस व्यक्ति को प्रेम संबंध में सुख प्राप्त होता है।

प्रेम-विवाह के ज्योतिषीय दृष्टिकोण:
जन्मकुंडली में प्रेम विवाह संबंधी संभावनाओं का विश्लेषण करते समय सर्वप्रथम पंचम् भाव का अध्ययन करना अति आवश्यक है क्योंकि पंचम् भाव व्यक्ति से संकल्प, विकल्प, इच्छा, मैत्री, साहस, भावना और योजना-सामर्थ्य का ज्ञान कराता है। सप्तम् भाव से विवाह, सुख, सहभागी तथा सहभागिता देखते हैं।
नवम् भाव से प्रेम विवाह में जाति धर्म देखते हैं। एकादश भाव इच्छा पूर्ति का भाव होता है। द्वितीय भाव पारिवारिक संतोष को प्रकट करता है। सप्तम् भाव काम त्रिकोण का मुख्य भाव है। एकादश भाव काम त्रिकोण का तीसरा और काम इच्छा पूर्ति का भाव है। प्रथम भाव या लक्षण स्वयं। सप्तम् भाव शक्ति अर्थात् शिव और शक्ति का मिलन भाव है। जन्म कुंडली में पुरूष के लिए शुक्र तथा स्त्री (कन्या) के लिए मंगल ग्रह का अवलोकन किया जाता है। शुक्र आकर्षण, सेक्स, प्रणय, सौंदर्य, विलासिता का प्रेरक है। मंगल उत्साह-उत्तेजना का। जन्मकुंडली में मंगल जितना प्रभावी होगा, जातक उसी के अनुसार साहसी और धैर्यवान होता है। यह दोनों ग्रह काम परक क्रियाकलापों के उत्तरदायी हैं।
चंद्रमा मन-भावना, इच्छाशक्ति का स्वामी है। बृहस्पति (गुरू) योजना-निर्माता है। इन चारों ग्रहों का प्रभाव सामाजिक स्तर पर प्रणय योग को जन्म देता है।

प्रेम विवाह के योग
 प्रेम विवाह क लिए पंचम, सप्तम् व नवम् (5-7-9) भाव तथा उनके स्वामियों का आपसी संबंध, दृष्टि या परिर्वतन द्वारा होना।
 एकादशेश या एकादश में स्थित ग्रह का संबंध सप्तमेश या सप्तम् से पंचम् या पंचमेश से, शुक का संबंध लग्न, पंचम् या सप्तम् भाव से हो।
 पंचम भाव का शुक्र प्रेम का शुद्ध स्वरूप स्थापित करता है।
 पंचमेश और सप्तमेश का एक साथ होना।
 पंचमेश का मंगल के साथ पंचम भाव में होना।
 लग्नेश का पंचमेश, सप्तमेश या भाग्येश से संबंध।
 सप्तमेश का एकादश भाव में तथा एकादशेश का सप्तम् में होना।
 मंगल, शुक्र तथा लग्नेश का संबंध
 शनि पर राहु मंगल का प्रभाव हो तथा चंद्रमा मध्य में आ जाए।
 मंगल और शुक्र का युति योग, तृतीय या चतुर्थ भाव में हो, तो पड़ोस में या एक ही बिल्डिंग में रहने वाले व्यक्ति से प्रेम संबंध बनता है। यदि बृहस्पति केंद्र या त्रिकोण में हो, तो प्रेम संबंध के पश्चात् विवाह भी हो जाता है।
 मंगल और शुक्र दोनों नवम् या दशम् भाव में हों, तो आकर्षक कार्य स्थान में होता है। साथ कार्य करने वाले या उच्च पद के व्यक्ति के प्रति। बृहस्पति तीसरे स्थान में अथवा केंद्र या त्रिकोण में हो तो विवाह की संभावना बनती है।
 पंचमेश के साथ बुध या बृहस्पति के साथ मंगल और शु का संबंध, चतुर्थ, पंचम, दशम् या एकादश भाव(4, 5, 10, 11) में बने तो स्कूल, कॉलेज में, शिक्षक या सहपाठी के बीच प्रेम-संबंध बनता है।
 यदि लग्नेश और षष्ठेश एक साथ हों या दृष्टि संबंध हो, तो व्यक्ति अपने प्रेम संबंध को बनाए रखने के लिए सतत प्रयत्नशील रहता है। यदि लग्नेश या षष्ठेश में से एक ग्रह शु या चंद्रमा हो और लग्न, पंचम,नवम् या द्वादश (1-5-9-12) भाव में हो, तो प्रेम संबंध में स्थायित्व की संभावना होगी। (लग्न वृषभ, कर्क, तुला या कुंभ, धनु हो)। यदि दो प्रेमियों में से किसी भी एक की कुंडली में द्वितीयेश, सप्तमेश और दशमेश तीनों ग्रह दशम् भाव में हों, तो प्रेम संबंधों का प्रभाव व्यापार, व्यवसाय या नौकरी के लिए शुभ फलदायी होता है। द्वितीयेश या सप्तमेश चतुर्थ में हो और चंद्रमा, मंगल, शुक्र से युति, दृष्टि या परिर्वतन हो, तो अपने ननिहाल के परिवार से संबंध बनता है। दक्षिण भारत में यह योग्य अक्सर मिलता है, क्योंकि वहां मामा से विवाह किया जाता है। बृहस्पति की युति, बुध या चंद्रमा या शुक्र के साथ पंचम, सप्तम या नवम् भाव में ही, तो एक सामान्य स्थिति के व्यक्ति का संबंध बहुत ही धनवान या उच्च पद के व्यक्ति से होगा।
यदि यह योग वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला या मीन राशि में बने तो प्रबल योग होता है। पुरुष कुंडली में शुक्र तथा स्त्री कुंडली में समान राशिगत हों अर्थात् जिस राशि में पु्रुष का शुक्र हो, स्त्री कुंडली में उसी राशि में मंगल हो, तो उन दोनों में प्रेमाकर्षण होता है। यदि दोनों ग्रहों के अंश समान हों, तो अपरिसीम आकर्षण उत्पन्न होता है। यदि स्त्री कुंडली में मंगल और पुरुष कुंडली में शुक्र आपस में केंद्र या त्रिकोण में हों, तो आपसी प्रेमाकर्षण होता है। परंतु यह दोनों 2-12 या षडाष्टक (6-8) हों तथा राशियां भी अलग-अलग हों, तो विकर्षण रहता है। यदि यही शुक्र-मंगल 3-11 हों, तो आकर्षण धनीभूत होता है। किसी भी देश की सरकार में उच्च पदाधिकारियों के प्रेम संबंध स्थापित होने में उस व्यक्ति की कुंडली मे शु के साथ-साथ सूर्य और मंगल पर भी ध्यान देना होगा।
राजनीतिज्ञों और प्रशासनिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के कारक ग्रह सूर्य और मंगल हैं तथा प्रेम अथवा विवाह का कारक ग्रह शुक्र है। इसी प्रकार जल सेना, जल पोतों पर काम करने वाले व्यक्तियों की कुंडली में शुक्र का संबंध चंद्रमा और मंगल से भी होता है। फिल्म जगत् में काम करने वाले अभिनेता, अभिनेत्री, डायरेक्टर, टेक्नीशियन अथवा कलाकारों के प्रेम संबंधों तथा विवाह में चंद्रमा एवं शुक्र का प्रभाव रहता है।
यदि चंद्रमा या शुक्र अथवा दोनों 6-7-8 या 12वें भाव में हों और इनके साथ मंगल, बुध, शनि राहु या हर्षल का युति योग, दृष्टि योग बने तो ऐसे कलाकार का किसी व्यक्ति के साथ लंबे समय तक प्रेम संबंध चलेगा। यदि चंद्रमा या शुक्र की उपर्युक्त स्थिति के साथ बली बृहस्पति या केतु का दृष्टि या युति योग बने तो प्रेम संबंध विवाह में परिणीत हो जाएगा। यदि चंद्रमा या शु की उपर्युक्त स्थिति के साथ बुध या बृहस्पति या केतु का किसी प्रकार का संबंध नहीं हो तथा साथ ही चंद्रमा या शुक्र की उपर्युक्त स्थिति के साथ मंगल, शनि, राहू अथवा हर्शल का किसी भी प्रकार का संबंध हो, तो उक्त प्रेम या विवाह अधिक समय तक नहीं चलेगा।

धर्म परिवर्तन
प्रेम एक ऐसी अभिव्यक्ति है, जो कि जाति-धर्म से अलग है। प्रेम करने वाले दो इंसान विवाह करने के लिए अपना धर्म तक परिवर्तित कर लेते हैं।
यदि सप्तम् और नवम् भाव में एक-एक क्रूर ग्रह हों, तथा इन दोनों का किसी अन्य बली ग्रह से कोई संबंध नहीं बन रहा हो तो ऐसा व्यक्ति विवाह के लिए अपना धर्म परिर्वतन कर लेगा। यदि सप्तम् भाव में चंद्रमा, मंगल या शनि की राशि (कर्क, मेष, वृश्चिक, मकर या कुंभ)हो तथा द्वादश भाव में कोई भी दो क्रूर ग्रह हों, तो विवाह के लिए धर्म परिवर्तन होगा।
यदि शनि छठे या सातवें भाव में स्थित हो या छठे भाव से सप्तमेश को दृष्ट करे तो ऐसे व्यक्ति परंपरा के विरुद्ध जा कर अपनी जाति के बाहर या विदेशी के साथ प्रेम विवाह करते हैं। शनि की विशेषता है कि किशोरावस्था में प्रेम संबंध स्थापित करा देता है और कई वर्ष पूर्व समाप्त हुए प्रेम संबंध को दोबारा शुरू करा देता है या यह कहें कि विवाहित जीवन में अनुचित या अनैतिक प्रेम संबंध बना देता है। यह स्थिति तब आती है जब शनि सप्तम भाव पर गोचर करता है या शनि की महादशा अथवा अंर्तदशा हो। शनि के प्रभाव के कारण 15-20-28 अथवा 30 वर्ष पुराने संबंध नए सिरे से स्थापित हो जाते हैं।
जन्म कुंडली में पुरुष के लिए शुक्र तथा स्त्री (कन्या) के लिए मंगल ग्रह का अवलोकन किया जाता है। शुक्र आकर्षण, सैक्स, प्रणय, सौंदर्य विलासिता का प्रेरक है। मंगल उत्साह-उत्तेजना का जन्मकुंडली में मंगल जितना प्रभावी होगा, जातक उसी के अनुसार साहसी और धैर्यवान होता है।

सारांश : सभी योग तभी फलीभूत होते हैं जब उन योगों में सम्मिलित ग्रहों की दशा या अंतर्दशा आएगी (देश-काल-पात्र का ध्यान अवश्य रखना चाहिए)। दशा के साथ-साथ गोचर भी अनुकूल होना चाहिए। विवाह एक सामाजिक कार्य है। प्रेम संबंध और विवाह दोनों को अलग नहीं रखा जा सकता। विवाह के पश्चात् प्रेम संबंध बने, यह अनुचित है। प्रेम विवाह कब होगा? इसके लिए सर्वप्रथम कुंडली में विवाह का योग होना आवश्यक है। जन्म लग्न, चंद्र लक्षण तथा शुक्र लग्न से सप्तमेश की दशा-अंतर्दशा में अनुकूल गोचर में तथा शुभ मुहूर्त में ही विवाह संपन्न होगा।

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